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Reading: महातपस्वी महाश्रमण का महाश्रम : एक दिन में किया 26 कि.मी. का विहार
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महातपस्वी महाश्रमण का महाश्रम : एक दिन में किया 26 कि.मी. का विहार

Last updated: November 19, 2025 7:24 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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Highlights
  • श्रद्धालुओं की श्रद्धा पर मुहर, एक दिन में तीन स्थानों पर ज्योतिचरण
  • वागदरी के आचार्य महाप्रज्ञ नेत्र चिकित्सालय में शांतिदूत का मंगल शुभागमन
  • अहिंसा, संयम व तप से भावित हो जीवन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
  • संस्थान से जुड़े लोगों ने दी भावनाओं की अभिव्यक्ति, अर्पित किए कृतज्ञ भाव
  • सुबह 12, दोपहर 8 व सायं 6 कि.मी. का हुआ विहार
  • रात्रि प्रवास हेतु करनाउवा पहुंचे अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमण

वागदरी, डूंगरपुर (राजस्थान)। जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने तथा जनकल्याण के लिए गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, अखण्ड परिव्राजक महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार कोे श्रद्धालुओं की श्रद्धा पर मुहर लगाते हुए एक दिन में 26 किलोमीटर का विहार कर मानों आचार्यश्री ने अपनी अखण्ड परिव्राजकता को चरितार्थ कर दिया। भक्तों की भावनाओं स्वीकार कर तथा स्वयं की सुविधाओं को गौण कर, महाश्रम करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने एक दिन में तीन विहार करते क्रमशः 12 किलोमीटर, 8 किलोमीटर व 6 किलोमीटर का विहार किया।
आचार्यश्री की इस अनुकंपा को प्राप्त कर श्रद्धालु जन धन्यता की अनुभूति कर रहे थे। बुधवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गत कई दिनों से डूंगरपुर जिले के एक क्षेत्र वागदरी में संचालित जागरण जन सेवा मण्डल के सदस्यों द्वारा निरंतर प्रार्थना की जा रही थी कि आचार्यश्री वहां संचालित आचार्य महाप्रज्ञ नेत्र चिकित्सालय में पधारें। श्रद्धालुओं की श्रद्धा, आस्था व भावनाओं को देखते हुए यह निर्णय किया कि वागदरी आज जाना है। यह वागदरी निर्धारित मार्ग से कुछ हटकर स्थित है। यहां जाने और आने के कारण आगे के निर्धारित स्थानों में स्वाभाविक रूप में वृद्धि हो रही थी, किन्तु महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने महाश्रम का निर्णय किया और अपने कदम बढ़ा लिए उस दिशा की ओर। यह सूचना मिलते ही संबंधित श्रद्धालुओं के तो मानों पांव ही जमीं पर नहीं टिक रहे थे। आचार्यश्री मुख्य मार्ग को छोड़कर ग्रामीण रास्ते उस ओर पधारे। कहीं संकरे, कहीं आरोह-अवरोह से युक्त मार्ग पर स्थान-स्थान पर उन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों को भी राष्ट्रसंत आचार्यश्री के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था।
आचार्यश्री अपने दोनों करकमलों से लोगों पर आशीषवृष्टि करते हुए आज के प्रथम विहार में करीब 12 किलोमीटर की यात्रा कर वागदरी में जागरण जनसेवा मण्डल द्वारा संचालित ‘आचार्य महाप्रज्ञ नेत्र चिकित्सालय’ तथा ‘गोविंद गुरु विद्या निकेतन’ परिसर में पधारे तो मानों श्रद्धालुजन व इस संस्था से जुड़े हुए लोग तथा विद्या निकेतन के विद्यार्थी महामानव के अभिनंदन में पलक-पांवड़े बिछाए हुए थे। आचार्यश्री के दोनों करकमल इन श्रद्धा से भरे हुए श्रद्धालुओं पर आशीष की अनुपम वृष्टि कर रहे थे। यहां आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों व श्रद्धालुओं को मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि धर्म को उत्कृष्ट मंगल बताया गया है। अहिंसा, संयम और तप धर्म है। जिस प्राणी के जीवन में अहिंसा, संयम और तप है तो उसके जीवन में धर्म भी है और उसका जीवन मंगलमय भी है। आदमी की दृष्टि सम्यक् हो जाए तो उसके जीवन का कल्याण हो सकता है।
कठिनाई आने पर भी आदमी धर्म के पथ पर डटा रहे, ऐसी श्रद्धा, आस्था दृढ़ हो ऐसा प्रयास होना चाहिए। क्रोध, मान, माया और लोभ, राग-द्वेष की भावना पतले पड़ जाएं तो जीव सही दिशा में गति कर सकता है। विवेकशील, ज्ञानी आदमी की संगति करने का प्रयास करना चाहिए और यदि स्वयं की प्रज्ञा जागृत हो जाए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। आचार्यश्री ने कहा कि आज वागदरी स्थित आचार्य महाप्रज्ञ नेत्र चिकित्सालय में आना हुआ है। योग, संयोग, नियति होती है तो यहां आना हो गया। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी इस एरिया के आसपास पधारे थे और आज हमारा भी यहां आना हो गया है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के नाम से यह चिकित्सालय है। वे जीवन के ग्यारहवें वर्ष में ही संत बन गए थे। आचार्यश्री तुलसी ने उन्हें युवाचार्य घोषित ही नहीं किया, उन्होंने अपने जीवनकाल में आचार्य पद को छोड़कर आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को प्रदान कर दिया। आगम के संपादन कार्य को आगे बढ़ाने में आचार्यश्री महाप्रज्ञजी बहुत ही योगदायी हैं।
उन्होंने प्रेक्षाध्यान की पद्धति को आगे बढ़ाने वाले रहे। शिक्षा जगत के लिए जीवन विज्ञान का विकास किया। एक संत पुरुष का नाम इस चिकित्सालय से जुड़ा हुआ है। यहां खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक माहौल रहे। यहां आने वाले मरीजों की बाहर की नेत्र तो अच्छी हो ही, मान लें भीतर की धर्म की आंख भी उद्घाटित हो जाए तो जीवन का कल्याण हो सकता है। आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित किया। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने बच्चों को भी पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि यहां पढ़ने वाले बच्चों में ज्ञान के साथ-साथ सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का भी विकास होता रहे।
आचार्यश्री के आह्वान पर बच्चों ने इनके संकल्प भी स्वीकार किए। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. दलजीत यादव ने नवनिर्मित छात्रावास का नाम ‘महाश्रमण निलय’ रखने की घोषणा की। आचार्यश्री के स्वागत में जागरण जनसेवा मण्डल के अध्यक्ष डॉ. दलजीत यादव, संस्थापक श्री मूलचन्द लोढ़ा, श्री विमल चोरड़िया व भीखमचंद नखत ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। दोपहर लगभग डेढ़ बजे के आसपास युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने वागदरी से प्रस्थान किया और लगभग आठ किलोमीटर का विहार कर बारो का शेर नामक स्थान पर पधारे। वहां भी अल्प विराम के उपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पुनः विहार किया और लगभग छह किलोमीटर का विहार सम्पन्न कर रात्रि प्रवास के लिए राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, करनाउवा में पधारे। इस प्रकार आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए एक दिन में लगभग 26 किलोमीटर का विहार किया। आचार्यश्री का यह श्रम जन-जन के मानस आचार्यश्री के प्रति प्रणत बना रही थी।

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