झालावाड़ के पीपलोदी गांव में सरकारी स्कूल की छत गिरने से मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया हैं। हादसे के बाद आक्रोशित ग्रामीण और परिजन सड़क पर हैं, धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और जिम्मेदारों से जवाब मांग रहे हैं। लेकिन अफसोस, सत्ता पक्ष संवेदना से ज़्यादा संविधान पढ़ने की मुद्रा में नज़र आ रहा हैं।
सरकार की ओर से शिक्षा मंत्री ने मृतक बच्चों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये मुआवजे का ऐलान किया हैं और संविदा पर नौकरी का सिर्फ़ आश्वासन दिया हैं। लेकिन ध्यान दीजिए – घायल बच्चों के लिए न कोई मुआवजा, न कोई स्पष्ट नीति। क्या चोटिल बच्चों की पीड़ा बजट के दायरे में नहीं आती?
अब सवाल ये हैं:
- क्या एक मासूम की ज़िंदगी की कीमत महज़ 10 लाख हैं?
- जब सरकारी बजट में करोड़ों रुपये भवन निर्माण और शिक्षा मद में स्वीकृत होते हैं, तो मौत के बाद मुआवजा सिर्फ लाखों में क्यों?
- बढ़ती महंगाई, ब्याज दरें, घटती मुद्रा की क्रयशक्ति और मानव जीवन मूल्यांकन (Human Life Value Calculation) – ये सभी विषय क्यों आम लोगों से छिपा दिए जाते हैं?
आज मुआवजे की राशि घोषित की जाती हैं जैसे सरकार कोई एहसान कर रही हो, जबकि असली सवाल यह हैं कि हादसे को टालने के लिए क्या किया गया था ? सरकार ने कहा कि “भव्य स्कूल” बनाया जाएगा। लेकिन क्या उस भव्य इमारत की नींव उन मासूम बच्चों की कुर्बानी पर रखी जाएगी, जिनकी मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, एक प्रशासनिक अपराध है? और अंत में सबसे जरूरी सवाल: क्या जवाबदेही सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस में होती हैं या कभी दोषियों की सजा और नीति में सुधार तक भी पहुंचेगी?
जब तक सवाल उठेंगे नहीं, तब तक मुआवज़ों के चेक भरते रहना ही ‘नीति’ कहलाता रहेगा

