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Reading: कषायों से मुक्त जीव होता है अभय : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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कषायों से मुक्त जीव होता है अभय : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: July 22, 2025 1:58 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • -आचार्यश्री ने दुःख के कारणों व अभय बनने की विधा को किया व्याख्यायित
  • -तेरापंथ प्रबोध का संगान व व्याख्यान का श्रीमुख से श्रवण कर निहाल हुई जनता

कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। प्रेक्षा विश्व भारती से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी निरंतर ज्ञान की गंगा प्रवाहित कर रहे हैं। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचने वाले श्रद्धालु व अहमदाबादवासी श्रद्धालु नियमित रूप से गोते लगाकार अपने जीवन को धन्य बना रहे हैं। वर्तमान समय में आचार्यश्री 32 आगमों में सबसे प्रमुख व प्रथम स्थान प्राप्त ‘आयारो’ आगम के आधार पर जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान कर रहे हैं। सोमवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के भीतर भय की वृत्ति भी होती है। आदमी डरता है, किन्तु कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो पूर्णतया अभय हो जाते हैं। आगम में उनके लिए अकुतोभय कहा गया है।

वैसे लोग जिनको किसी से कोई भय न हो और उसे किसी भी दिशा से भी भय न हो, वह अकुतोभय अर्थात अभय होता है। प्रश्न हो सकता है कि आदमी अकुतोभय (अभय) कैसे बना जा सकता है? आगम में इसका समाधान दिया गया है कि लोक को जानकर, यहां लोक का अर्थ कषाय के रूप में हुआ है। कषाय अर्थात क्रोध, अहंकार, माया और लोभ, इनको जो जान ले और समझ ले और जान लेने के बाद उनको छोड़ने का प्रयास करे तो वह अभय हो सकता है। ज्ञान की प्राप्ति अच्छी बात होती है, लेकिन ज्ञान होने के साथ-साथ उसकी क्रियान्विति भी हो जाए तो बहुत अच्छी बात होती है। ज्ञान होता है तो आचरण भी होता है। जो जीव-अजीव को नहीं जानता वह भला क्या संयम कर सकता है। शास्त्र में बताया गया कि आदमी कषायों को जान ले और फिर उन्हें छोड़ दे तो वह आदमी अकुतोभय अर्थात अभय बन सकता है।

आदमी को भय दुःख का लगता है। कषाय को दुःख का कारण कहा जाता है। जब कषाय नहीं रहेगा तो दुःख भी नहीं होगा और जब दुःख ही नहीं रहेगा तो आदमी अभय बन सकता है। साधना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व होता है कषाय विजय कर लेना। आदमी कभी गुस्से में आ जाता है तो कुछ गलत बोल भी देता है, कभी गलत कार्य भी कर लेता है। जब आदमी का गुस्सा शांत होता है तो उसके बाद उसे भय होने लगता है कि अब मेरा आगे क्या होगा। अब यह उसके मन में भय हो जाता है। यह भय गुस्से रूपी कषाय के कारण हो गया। इसी प्रकार अहंकार, छल-कपट और लोभ के कारण से ही भय होता है। आदमी कषायों के वशीभूत होकर जो कुछ गलत कार्य करता है तो उसे उसके आगामी परिणामों को लेकर भयभीत भी हो जाता है। कषायों पर विजय प्राप्त करना बहुत बड़ी साधना है।

आदमी को अपने जीवन में कषायों को पतला, कृश अथवा पूर्ण रूप से क्षय करने का प्रयास करना चाहिए। जीव अपने दुःख को स्वयं पैदा करता है। दूसरे दुःख देने मंे निमित्त भले बन जाएं, लेकिन दुःख पैदा करना व्यक्ति के स्वयं द्वारा कृत कर्म ही होते हैं। इसलिए आदमी कषायों को दूर किया जाए सके तो कर्म वैसे बंधेंगे नहीं तो आदमी को भय भी नहीं होगा और अकुतोभय अर्थात् वह अभय बन सकेगा। आगम वाणी से जीवनोपयोगी प्रेरणा प्रदान करने के उपरान्त आचार्यश्री ने ‘तेरापंथ प्रबोध’ के संगान व उसके व्याख्यान से जनता को लाभान्वित किया। अहमदाबाद में चल रही पचरंगी के संदर्भों में तपस्वियों ने अपनी-अपनी धारणानुसार तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया। श्री शांतिलाल चोरड़िया ने आचार्यश्री के समक्ष अपने गीत का संगान किया।

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