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जब तक हम स्वयं में आत्मविश्वास नही लाएँगे हम आगे नही बढ़ पाएंगेः आचार्य श्री  अरविंदसागरसूरीश्वरजी

Last updated: September 22, 2022 12:22 pm
Surabhi Saloni
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8 Min Read
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वीवीपुरम। श्री आदिनाथ जैन श्वेतांबर संघ, चिकपेट के तत्वावधान में श्री संभवनाथ जैन मंदिर दादावाडी (वी.वी.पुरम्) के प्रांगण में हृदयस्पर्शी प्रवचनकार आचार्य श्री  अरविंदसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि जब तक हम स्वयं में आत्मविश्वास नही लाएँगे हम आगे नही बढ़ पाएँगे। अनमोल मानव भव मिला है जिस समय सम्यक् ज्ञान आ जाए उसी समय से जीवन में परिवर्तन लाना है।अध्यात्म दिशा में आगे बढ़ना है।दिस या देट ये हमें चुनना है। बुद्धीसागरसूरी प्रवचन वाटिका में क्रिएटिंग यंग लीडर्स के अंतर्गत विषय “दिस या देट“ में युवपीढ़ि को प्रेरणा देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जैसी जानकारी वैसा निर्णय -इस दिशा में दिस या देट विषय में चुनना है। कई बार ज़िंदगी में दोराहें पर खड़े होते है वहाँ सही समझ ना होने के कारण ग़लत दिशा चुन लेते है। इस दुविधा में हम लक्ष्य मंज़िल से दूर होते जाते है। हमें दिशाहीन करने हेतु कई विकल्प मिलते है लेकिन हमें मार्ग से भटकना नही है। इसलिए आज का यह सेशन रखा गया है।हमारी ज़िंदगी में ख़ुशियाँ जिसकी वजह से आयी है उस ओर हमारा ध्यान नही जाता है हमारे जीवन में प्राप्त उपलब्धियों को जानने के लिए ही यह सेशन रखा गया है। हमें लोगों की पहचान होनी चाहिए सही मार्गदर्शक पर फ़ोकस हो। घटित घटनाओं में किस-किस का उपकार है। इस ओर ध्यान देना है।
व्यक्ति के जीवन में अनेक व्यक्ति प्रभावित होते है कुछ ग़लत राह पर ले जाते है और कुछ शून्य से शिखर तक पहुँचाते है सज्जन और दुर्ज़न की पहचान हो। जीवन बदल जाए वैसी दिशा पानी है। क्या पाना है वह निर्णय हमें करना है। उचित-अनुचित का ध्यान रखना है।गणिवर्य हीरपद्मसागर जी ने “इतनी शक्ति हमें देना- गीत का आंशिक संगान किया । मुख्य प्रक्षिक्षक राहुल कपूर जैन ने कल्याण मित्र की परिभाषा यानी सही गुरु जीवन में जो सफलता है दे, जो हमें पानी है। दुःख क्या होता है असफलता क्या होती है यह हम जान सकते है । ज़िंदगी में ख़ुशी और ग़म साथ-साथ आते है। हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ सही-ग़लत का चुनाव करना है सफलता वही जहाँ कल्याण मित्र साथ होता है।हमें हमारे जीवन के उन कल्याण मित्रों को आज याद करना है।कल्याण मित्र की क्या पहचान-वह किसी भी समुदाय का हो सकता है। धर्म-अधर्म की समझ हो। किसी भी परिस्थिति में सही का साथ दे।भगवान महावीर ने कितने विकल्प बताए हमारी जैसी शारीरिक संरचनाएँ वैसे हम कार्य करे बशर्ते हमें सही ज्ञान और प्रकाश में जीना आना चाहिए। इच्छाओं पर अंकुश रखना सीखे। जैन पदत्ति में द्रव्य सीमा से स्वयं पर, कषायों पर नियंत्रण सीखाता है।
कीचड़ में भी कमल की तरह खिले वह है जैन। जो भक्ष्य-अभक्ष्य को जाने वो जैन। हज़ारों-लाखों में हमारे खान-पान, रहन-सहन जैनत्व की पहचान हो। हमारे क्रोध-मान-माया-लोभ सदा हँसी-विनोद-स्नेह-संतोष में बदले वह जैन है। हमारा चुनाव सही चीज़ों के प्रति हो। अहिंसा धर्म का पालन हो।भीतर छुपी प्रतिभा को जाने। आज से अभी से जीवन में परिवर्तन आए। हम संकल्प ले मल्टी क्यूसिन होटेल नही जाएँगे।जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो।हमारी प्रतिभा के साथ हमारा व्यवहार, सोच, समझ बढ़े। तभी हम सबके जीवन में स्थान पाएँगे।कई प्रायोगिक प्रशिक्षण एवं छोटे-छोटे मनोरंजक खेल के माध्यम से जीवन के हर पड़ाव में शांति का संचार सीखना है। पाँच समन्वय है जिनका विस्तार बताया।
काल -time, स्वभाव -nature, नियति -destiny, कर्म-karm, पुरुषार्थ- efforts ।इस संदर्भ में उदाहरण महात्मा गांधी न केवल बाहर से बल्कि अपने कर्म से भीतर भी महात्मा रहे।पुरुषार्थ से व्यक्ति काल,स्वभाव, नियति और कर्म सब बदल सकता है।साधारण से असाधारण बन सकते है।एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण हमारे सामने है।आचार्य अरविंदसागरसूरिश्वरजी हमारे सामने एक उदाहरण है-कर्म उदय में आए तब स्वास्थ्य भी प्रतिकूल हो गया बचने की कोई आस नही उस समय मन में यही विचार आया की इस परिस्थिति से बाहर निकलना मुश्किल लग रहा है क्यों ना संकल्प लिया जाए की आने वाले समय में आयुष्य रहा तो दीक्षा लेनी है अपने जीवन को संघ में समर्पित करूँगा। एक सोच ने जीवन बदल दिया। विकल्प ख़ूब थे पर पुरुषार्थ सही दिशा में करने का चुनाव किया और लक्ष्य मंज़िल की राह बढ़ रहे है।धर्म और अधर्म इन दोनों में सही चुनाव हमारी आत्मशक्ती पर निर्भर है। कई कठिन परीक्षा और कष्ट भरी राह क्यूँ ना हो धर्म का साथ और विश्वास कभी नही छोड़ना चाहिए। धर्ममय जीवन में सफलता है शांति है सकारात्मक्ता है।
द्वितीय सत्र में एक साक्षात्कार के द्वारा मुमक्षु प्रवीण कांकरिया और मुमुक्षु सलोनी चौहान के जीवन में बदलाव को देख उपस्थिति युवापीढ़ी ने प्रेरणा पायी ।साधारण से असाधारण की गाथा, शून्य से शिखर तक का सफ़र साझा किया। चेन्नई में रहनेवाला ऊँचे-ऊँचे ख़्वाबों में जीनेवाला प्रवीण ने कई कम्पनियों में कार्य किया, स्वयं का व्यवसाय किया। सलोनी पांडिचेरी की रहनेवाली के जीवन में उपधान तप से बदलाव आया क़ोरोना महामारी जैसे काल में दो मॉडल सही मायने में आध्यात्मिक मॉडल बने।हर युवा की तरह इनके भी भविष्य में कुछ बनने की योजनाएँ थी। उस ओर क़दम भी बढ़ाए पर जैसे जैसे धर्म को जाना, गुरु को माना जीवन में बदलाव आना शुरू हुआ। दीक्षा आज्ञा में थोड़ी कठिनाई आयी परीक्षा भी ली गयी लेकिन दृढ़ संकल्प के कारण सफलता मिली।दीक्षा क्यूँ लेनी- मुमुक्षु सलोनी ने कहा इच्छाएँ तो अनंत है ये कभी ख़त्म नही होगी, कितना इंसान भागेगा इच्छाओं के पीछे। संयम जीवन ही एक ऐसा जीवन है जहाँ इच्छाओं की समाप्ति हो जाती है।मुमुक्षु प्रवीण ने कहा की शरीर का बाहरी वातावरण में हम कितना फँसे हुए है हमें आत्मज्ञान की ट्रेन पकड़नी है जैन दर्शन के स्टेशन तक पहुँचना है।कितना भी भटकाव मिले हम वर्तमान में जियें। जिज्ञासा बिना पहुँचना सम्भव नही और हमारा समर्पण-श्रद्धा भाव सदा टिका रहे । हमारे गुरु हमारे भगवान है जिनके कारण से हम अपना लक्ष्य चुनते है।हमारे गुरु हमारे गुणों को पहचान उन्हें आगे बढ़ाते हुए जीवन को प्रकाशमान करते है।
आचार्य भगवंत के मुख़ारविन्द से मंगल मंत्र द्वारा कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। श्री संघ द्वारा दीपप्रज्वलन किया गया । अध्यक्ष श्री गौतम जी सोलंकी ने सभी का स्वागत किया । श्री संघ की ओर से इस आयोजन से जुड़े व्यक्तियों का एवं लाभार्थी “माणक़ मेवा” का सम्मान मोमेंटो द्वारा किया गया। निकी कोठारी एवं बिन्दु रायसोनी ने विचार रखे। उपस्थित युवाओं द्वारा चर्चा- परिचर्चा चली। भैरुमल दाँतेवाडिया ने धन्यवाद दिया। राहुल कपूर की टीम का पूर्ण सहयोग रहा। लगभग 350 युवाओं की उपस्थिति रही। जीवन टीवी पर और यूट्यूब चेनलों पर हज़ारों ने इसे देखा।

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