25.09.2026, शुक्रवार, लाडनूं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी के रूप में ख्यापित लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ का दूसरे योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वाक्संयम’ के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि साधु की चर्या में वाक् गुप्ति का एक नियम होता ही है। एक सामान्य आदमी के लिए भी वाणी का विवेक और संयम उसे अहित से बचाने वाला और उसका हित करने वाला बन सकता है। आदमी बोलता है। बोलना जीवन की प्रवृत्ति है। जीवन व्यवहार का एक सक्षम माध्यम भाषा होती है। भाषा सत्य भी होती है, मृषा भी होती है, सत्य-मृषा भी होती है और असत्यामृषा भी होती है। साधु को मृषा भाषा से तो विशेष रूप से बचना और सत्य-मृषा भाषा से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। सत्य भाषा और असत्यामृषा का साधु प्रयोग कर सकता है, किन्तु इनके प्रयोग में भी साधु को विशेष विवेक रखने का प्रयास करना चाहिए। हर सत्य बात बोलना साधु के लिए अपेक्षित नहीं है और हर व्यवहार भाषा साधु के लिए बोलना आवश्यक नहीं होता।
यहां चारित्रात्माओं का विवेक वांछनीय होता है। वह सत्य भाषा भी जो दूसरों का अहित कराने वाली हो, हिंसा का कारक हो, साधु को ऐसी सत्य भाषा से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। व्यवहार भाषा भी ऐसा नहीं बोलना जो सावद्य हो। आगम में कहा गया है कि सत्य वचनों में भी जो अनद्य वचन है, निर्वद्य है, वह हितकर होती हैं। जहां बोलना उचित हो और हितकर हो, वहां अपनी वाणी का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। साधु तो तीन करण, तीन योग से मृषावाद का त्याग कर देता है, परन्तु सत्य बोलना ही पड़ेगा, ऐसा भी नहीं होता। असत्य नहीं बोलना यह नियम मान लें, लेकिन सत्य बोलना ही पड़ेगा, ऐसी बात नहीं है।
सत्य वचनों में भी अनवद्य, निर्वद्य वचन अच्छा होता है। आदमी सत्य बोल सकता है, लेकिन वह हितकर, लाभदायी है या नहीं, इसका भी विचार होना चाहिए। किसी को बदनाम करने की दुर्भावना से वे सत्य बातें भी वर्जनीय कही गई हैं। जहां उचित और हितकर हो, वहां वाणी का उपयोग किया भी जा सकता है। वचन गुप्ति वाचिक गुप्ति की एक साधना होती है। वाचिक हिंसा के प्रयोग से भी बचने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए चारित्रात्माओं को विविधि प्रेरणाएं प्रदान की। तदुपरान्त आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभाजी, साध्वी सुपार्श्वप्रभाजी, साध्वी ओमप्रभाजी, साध्वी कोमलप्रभाजी, साध्वी परमार्थप्रभाजी व साध्वी अर्चनाप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने साध्वी पद्मप्रभाजी से कुछ श्लोक भी सुनाने को कहा। साध्वीजी द्वारा श्लोकों का उच्चारण करने पर साध्वीजी को पांच कल्याणक तथा नवदीक्षित सभी साध्वियों को 21-21 कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया।
इस दौरान आचार्यश्री ने युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी द्वारा रामजशोरसाण के वाचन प्रारम्भ करने की घोषणा करते हुए उसके वाचन के समय आदि की भी जानकारी दी। साध्वी प्रेमलताजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। उनकी सहवर्ती साध्वियों ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।विद्या भारती स्कूल की छात्राओं द्वारा राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ को प्रस्तुति दी गई। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में कहा कि अभी राष्ट्रगीत का उच्चारण किया गया। ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर इस आयोजन की बात है। भारत में आध्यात्मिकता, नैतिकता के मूल्य भी पुष्ट होते रहें। भौतिक विकास चाहिए, आर्थिक विकास चाहिए तो नैतिकता व आध्यात्मिकता के विकास के प्रति भी जागरूक रहें। विद्या भारती के पास शिक्षा जगत का बल है। भावी पीढ़ी में नैतिकता, अहिंसा के अच्छे संस्कार भरने का प्रयास करती रहे, मंगलकामना।

