कोबा, अहमदाबाद (गुजरात)। धर्मनगरी अहमदाबाद आज एक बार फिर इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया जब युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सानिध्य में 70 वर्षीय दीक्षार्थी हनुमानमल दुगड़ ने भरे पूरे परिवार को छोड़ सांसारिक बंधनों को त्यागकर संन्यास का मार्ग अपनाया।
चातुर्मास के इस द्वितीय दीक्षा महोत्सव में आज सरदारशहर के हनुमानमल दुगड़ ने भौतिक जगत के सुख-सुविधाओं को त्याग, आत्मकल्याण और अध्यात्म के पथ पर अग्रसर होते हुए दीक्षा ग्रहण की। सब सुख सुविधा होने पर भी वैराग्य मार्ग पर आगे बढ़ना अपने आप में विरल उदाहरण है। अहमदाबाद के इस चातुर्मास में यह 18वीं दीक्षा है। इससे पूर्व 3 सितंबर को हुए भव्य दीक्षा समारोह में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सत्रह मुमुक्षुओं को दीक्षा प्रदान की थी, जिसमें दस दीक्षार्थी बहनों और सात दीक्षार्थी भाइयों ने संसार का त्याग कर वैराग्य पथ अपनाया था।
दीक्षा : केश लोच एवं नामकरण संस्कार
दीक्षा संस्कार प्रारंभ करते हुए आचार्य प्रवर ने दीक्षार्थी हनुमानमल जी को जैसे ही आगम पाठ द्वारा जैन भागवती दीक्षा प्रदान की समूचा पंडाल हर्ष ध्वनि से गुंजायमान हो उठा। तत्पश्चात आचार्यश्री ने केश लोच संस्कार करते हुए नवदीक्षित की चोटी के केशो का लूंचन किया। यह इस उक्ति का प्रतीक है कि शिष्य की चोटी गुरू के हाथ में रहती है। आर्ष वाणी का उच्चारण करते हुए साधुत्व चर्या का अभिन्न अंग रजोहरण नवदीक्षित को प्रदान किया। दीक्षा अध्यात्म का नव जन्म है इस हेतु गुरुदेव ने हनुमानमल जी “मुनि हेमऋषि” नाम प्रदान किया। इससे पूर्व उदित, मुदित, कल्प ने दीक्षार्थी का परिचय प्रस्तुत किया। पारमार्थिक शिक्षण संस्था के अध्यक्ष बजरंग जैन ने आज्ञा पत्र का वाचन किया।
साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी का सारगर्भित वक्तव्य हुआ। समारोह संचालन मुनि श्री दिनेश कुमार ने किया। प्रेक्षा विश्व भारती के पावन प्रांगण में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में हुए इन ऐतिहासिक पलों ने पूरे अहमदाबाद को भावविभोर कर दिया। जहां आधुनिक युग में भौतिकता की चकाचौंध युवाओं को आकर्षित कर रही है, वहीं ऐसे समय में सांसारिक मोह का त्याग कर संयम और साधना के मार्ग पर अग्रसर होना वास्तव में प्रेरणादायक और विरल घटना है। मंगल उद्बोधन में आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा- संयम जीवन का सुख देवलोक के सुख से भी बढ़कर होता है। जो साधुत्व मे रम जाता है वह महान होता है उसके बाद फिर आत्मिक सुखों के सामने देवलोक व स्वर्ग के सुख भी तुच्छ हैं। पैसा व पद, प्रतिष्ठा भी छोटे है।
कोई पूछे कि दीक्षा किसकी हो सकती है तो युवा, बाल, वृद्ध कोई क्यों न हो जो योग्य होता है उसकी दीक्षा हो सकती है। हालांकि न्यूनतम सवा आठ वर्ष आयु होती है, किन्तु योग्यता सबसे पहले है। हम क्वांटिटी चाहते है पर वह क्वालिटी के साथ हो। सिर्फ संख्या बढ़ाना हमारा लक्ष्य नहीं गुणवत्ता पूर्ण योग्य दीक्षा हो यह आवश्यक है। कई साधु साध्वियां वैरागी तैयार करते है। वह भी अपने आप मैं बड़ी बात है। गुरुदेव ने आगे फरमाया कि आज एक भाई की दीक्षा हो रही है। पूर्व में सत्रह दिशाएं हुई यह इस चतुर्मास की अठारहवीं दीक्षा होने जा रही है। नव दीक्षित साधु साध्वियों की संयम में जागरूकता रहे। हर कार्य में संयम का प्रयास हो। संयम में मजबूत निष्ठा और चित्त में शांति रहे।
जब जहां मौका हो सेवा के लिए तैयार रहे। बड़ा वह होता है जिसमें नम्रता होती है, जिसमें क्षमा शीलता होती है, भक्ति होती है, आदर भाव होता है वह बड़ा होता है। हमें स्वभाव को संस्कारों से ऊंचा रखना चाहिए। नवदीक्षित साधु साध्वियां खूब बड़े बने। भीतर में अच्छे संस्कार हो। सभी में आत्म निष्ठा, संघ निष्ठा, आज्ञा निष्ठा, आचार निष्ठा, मर्यादा निष्ठा हो।
दीक्षा समारोह घोषणा :-
आगामी सन् 2026 का चातुर्मास पूज्य गुरुदेव का लाडनूं में संभावित है। योगक्षेम वर्ष के दौरान वहां तीन दीक्षा समारोह की घोषणा करते हुए आचार्य श्री ने 8 फरवरी 2026 को मुमुक्षु खुशी की समणी दीक्षा, 6 मार्च 2026 मुमुक्षु रक्षा को साध्वी दीक्षा, 23 अप्रैल 2026 को मुमुक्षु चन्दन को साध्वी दीक्षा प्रदान करने की घोषणा की।
बीदासर चातुर्मास की घोषणा :-
कार्यक्रम के दौरान बीदासर (राजस्थान) से आज बड़ी संख्या में श्रावक समाज संघ रूप में उपस्थित था। सभी अपने आराध्य का चातुर्मास पाने को आतुरता से प्रतीक्षारत थे। पूर्व में गुरुदेव द्वारा थली प्रदेश में पहला चातुर्मास बीदासर में घोषित है। आज सन्, संवत् खोलते हुए गुरूदेव ने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अनुकूलता के आधार पर विक्रम संवत 2090 का चातुर्मास एवं मर्यादा महोत्सव बीदासर में करने की घोषणा की। यानी सन् 2033 का चातुर्मास एवं 2034 का मर्यादा महोत्सव बीदासर में आयोज्य होगा।
आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल : शुभारंभ संगोष्ठी
परम पूज्य आचार्यश्री के सानिध्य में आज जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा द्वारा आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल के नेशनल बोर्ड ऑफ गवर्नर की शुभारंभ संगोष्ठी आयोजित हुई। जिसके तहत आचार्य प्रवर से प्रेरणा पाथेय एवं मुख्यमुनि श्री महावीर, साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी, साध्वीवर्या संबुद्धयशा जी से मार्गदर्शन प्राप्त कर प्रेक्षा विश्व भारती के महाप्रज्ञ विद्या निकेतन प्रांगण में शुभारंभ संगोष्ठी आयोजित हुई। इस परियोजना के अंतर्गत देशभर में विभिन्न स्थानों पर “आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल” निर्माण की योजना है। जिसके तहत मुंबई, नोखा, श्री डूंगरगढ़, भुज जैसे कई स्थानों पर कार्य गतिमान भी हो गया है।
इस अवसरदेश भर से पहुंचे कोर टीम सदस्य एवं नेशनल बोर्ड मेंबर्स ने मंत्रोच्चार द्वारा शुभारंभ किया। ताम्रपट पर मंत्र लेखन किया गया जिन्हें प्रत्येक स्कूल के शिलान्यास के समय नींव में स्थापित किया जाएगा। इस अवसर पर महासभा के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि विश्रुत कुमार जी ने योजना की अवगति दी। जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री मनसुख सेठिया, महामंत्री श्री विनोद बेद, चीफ ट्रस्टी श्री महेंद्र नाहटा ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री हितेंद्र मेहता, उपाध्यक्ष श्री समीर वकील ने परियोजना प्रस्तुत की।
स्वर्ग के सुखों से बढ़कर है साधुत्व का सुख : आचार्य महाश्रमण
Highlights
- भव्य दीक्षा समारोह में हनुमानमल बने मुनि हेमऋषि
- चातुर्मास में गुरू महाश्रमण सान्निध्य में अठारहवीं दीक्षा
- बीदासर वासियों को मिला चातुर्मास सह मर्यादा महोत्सव का गुरू प्रसाद
- आचार्य महाश्रमण इंटरनेशनल स्कूल : शुभारंभ संगोष्ठी

