- व्रत चेतना दिवस के रूप में आयोजित हुआ पर्वाधिराज पर्युषण का पांचवा दिवस
- आचार्यश्री ने भगवान महावीर की अध्यात्मा यात्रा को पहुंचाया तेइसवें भव में
- संयम धर्म पर युवाचार्यश्री ने डाला प्रकाश
- व्रत चेतना दिवस के महत्त्व को साध्वीप्रमुखा ने किया वर्णित
- साध्वीवर्याजी ने पुनर्जन्मवाद को किया विश्लेषित
12.09.2026, शनिवार, लाडनूं। तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास सुसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में वर्तमान में पर्वाधिराज पर्युषण को भव्य एवं आध्यात्मिक रूप में समायोजित हो रहा है।
शनिवार को पर्युषण पर्वाधिराज का पांचवां दिन था, जिसे व्रत चेतना दिवस के रूप में समायोजित किया गया। मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में व्रत चेतना दिवस पर साध्वी कृतार्थप्रभाजी आदि साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने पुनर्जन्मवाद को विश्लेषित किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने ‘व्रत चेतना दिवस’ के अवसर पर जनता को उद्बोधित किया। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने संयम धर्म को व्याख्यायित किया।
भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान महावीर की आत्मा की इस आध्यात्मिक यात्रा में वर्तमान समय में अठारहवें भव में स्थित त्रिपृष्ठ भव का वर्णन चल रहा है। शेर की समस्या होने पर त्रिपृष्ठ जाता है और शेर को सामने निःशस्त्र देख, स्वयं भी अपने निःशस्त्र हो गए और शेर से युद्ध को चल पड़ते हैं। शस्त्र को छोड़ देने में किसी रूप में अहिंसा का दर्शन भी कर सकते हैं। शेर त्रिपृष्ठ पर झपटा तो, त्रिपृष्ठ ने उसका काम तमाम कर दिया। यह सूचना दूर-दूर तक फैलने लगी की शेर की समस्या समाप्त हो गई। प्रति वासुदेव अश्वग्रीव को इस बात की जानकारी मिली कि शेर की समस्या समाप्त हो गई और वह कार्य करने वाला पोतनपुर के राजा प्रजापति के पुत्र त्रिपृष्ठ है। इस बात की जानकारी होते ही अश्वग्रीव को अपने हंता के दोनों लक्षण प्राप्त हो गए। अब वह अपने हंता को मारने की योजना बनाने लगा। उसने पोतनपुर के राजा को अपने यहां सम्मानित करने की सूचना मिली तो वहां भी त्रिपृष्ठ ने अश्वग्रीव को कायर आदि कहते हुए उनके हाथ सम्मान प्राप्त करने की बात को ठुकरा दिया। इस बात से क्रोधित होकर अश्वग्रीव युद्ध के लिए उपस्थित हुआ। दोनों ओर से युद्ध हुआ और त्रिपृष्ठ ने अश्वग्रीव का वध कर स्वयं वासुदेव बन जाते हैं और अचल बलदेव बन जाते हैं। पोतनपुर में एक बार ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयासंनाथ का पदार्पण होता है। वहां वासुदेव त्रिपृष्ठ और बलदेव अचल उनके पास जाते हैं और उनका प्रवचन सुनते हैं। उससे त्रिपृष्ठ को सम्यक्त्व प्राप्त हो गया, लेकिन वह कुछ दिनों में समाप्त हो जाता है। एकबार त्रिपृष्ठ के यहां संगीत का आयोजन हो रहा था। त्रिपृष्ठ ने अपने सेवक को आज्ञा दी कि मैं सो जाऊं तो संगीत को बंद करा देना, किन्तु सेवक को संगीत में रस आ गया और उसने संगीत का आयोजन बन्द करवाया। इस बात क्रोधित हो त्रिपृष्ठ ने उसके कान में गर्म शीशा डालने का आदेश दे दिया, जिससे उस सेवक की मृत्यु हो गई। वहां का आयुष्य पूर्ण भगवान महावीर का जीव सप्तम नरक उत्पन्न होता है और उत्कृष्ट आयुष्य प्राप्त हो गया। पुनः वहां से भगवान महावीर का जीव सिंह के रूप में उत्पन्न होते हैं। इस जन्म का भी आयुष्य पूर्ण कर पुनः उनकी आत्मा चौथी नरक में उत्पन्न होती है। वह अपने तेइसवें भव में पश्चिमी विदेह क्षेत्र के मुकानगरी के राजा धनंजय के पुत्र प्रियमित्र के रूप में उत्पन्न होता है। प्रियमित्र चक्रवर्ती बने और अंत में दीक्षा स्वीकार कर ली। वहां से अवसान के बाद पुनः सातवें देवलोक में उत्पन्न होते हैं।
आचार्यश्री ने पर्वाधिराज पर्युषण के अंतर्गत आयोजित व्रत चेतना दिवस के संदर्भ में कहा कि व्रत चेतना में महाव्रत चेतना, सुमंगल साधना व्रत चेतना, बारह व्रत चेतना को देख सकते हैं और अणुव्रत चेतना को भी देख सकते हैं। आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत को व्यापक रूप प्रदान किया। जीवन में अच्छे व्रत होते हैं तो जीवन के लिए कल्याण की बात हो सकती है। आदमी अपने जीवन में जितना व्रत करे, संयम को स्वीकार करे, असंयम को छोड़े तो उसके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। सभी में व्रत चेतना का विकास हो, यह काम्य है। पर्युषण पर्वाधिराज का छठा दिवस जप दिवस के रूप में समायोजित होना निर्धारित है।


