चेन्नई। साध्वी श्री उदित यशा जी ने फरमाया—हम सभी व्रत लेकर ही इस संसार में आए हैं। दुनिया में कोई भी वस्तु पूर्णतः सुरक्षित नहीं है, सुरक्षा के लिए सुरक्षा-कवच आवश्यक है। जिस प्रकार शरीर की सात धातुओं की रक्षा चमड़ी करती है, उसी प्रकार जीवन की सुरक्षा व्रत और संयम से होती है।
बिना सुरक्षा के न शरीर सुरक्षित रह सकता है, न कोई वस्तु। त्याग में विवेक है और व्रत में चेतना के जागरण का संदेश है। व्रत का अर्थ है—संकल्प करना और उस संकल्प के आगे किसी विकल्प को स्थान न देना।
साधक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—आत्म-साधक और व्यावहारिक साधक। श्रावक चमन जी के उदाहरण के माध्यम से समझाया कि हमारी चेतना का वास्तविक जागरण तब होता है, जब हम शांत भाव से व्रत का पालन करते हैं और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ रहते हैं।
व्रत केवल नियम नहीं, बल्कि आत्म-जागरण और आत्म-सुरक्षा का कवच है।
साध्वी श्री संगीत प्रभा जी ने फरमाया—मनुष्य मुख्यतः चार कोटियों में आते हैं— यह नहीं, वह चाहिए। जो है, वही पर्याप्त है। यह भी चाहिए और वह भी चाहिए। यह भी नहीं चाहिए, वह भी नहीं चाहिए। आगे भगवान ऋषभदेव की भव-परंपरा का वर्णन करते हुए फरमाया कि वृद्धावस्था एवं ग्लानि के समय तपस्वी संतों की सेवा करना, देवलोक का आयुष्य बंध करना और उचित समय पर अनशन का त्याग करना—इन आध्यात्मिक साधनाओं के प्रभाव से जीव सैकड़ों भवों को पार कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। संतोष, सेवा और संयम—ये आत्मा को भव-सागर से पार लगाने वाले महत्वपूर्ण साधन हैं।
साध्वी श्री भव्य यशा जी ने व्रत चेतना दिवस पर अपने विचार प्रस्तुत किए और साध्वी श्री भव्य यशा जी एवं साध्वी श्री शिक्षा प्रभा जी ने छोटे छोटे व्रत पर सुमधुर गीतिका का संगान किया
आत्म का सुरक्षा कवच – त्याग व्रत नियम – साध्वी श्री उदित यशा जी

