पंकज श्रीवास्तव/(छपरा से लौटकर)। सारण और महाराजगंज की सीटे एक दूसरे लगती है। दोनों सीटों की लड़ाई करीब-करीब एक सी है। सारण से राजीव प्रताप रुढी और महाराजगंज से जनार्दन सिंह सिग्रीवाल (भाजपा) सांसद हैं। भले ही फिजा में इस बात को फैलाया जा रहा है कि ये लड़ाई भाजपा और राजद के बीच का है लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक अलग है। सबसे पहले महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो भाजपा प्रत्याशी जनार्दन सिंह सिग्रीवाल के सामने राजद के रणधीर सिंह हैं। रणधीर सिंह पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह के पुत्र हैं। वोट बैंक की बात करें तो इन्हें लालू प्रसाद के माई (मुस्लिम यादव) समीकरण पर भरोसा हैं। अगर व्यक्तिगत उपलब्धि की बात करें तो शुन्य। पिता प्रभुनाथ सिंह जरुर राजपुत समाज में अच्छी दखल रखते थे लेकिन इन पर सदैव आरोप लगा। इनके कार्यकाल में विकास की सुपरफास्ट ट्रेन सिर्फ राजपुत बस्तियों पर ही जाकर रुकी अन्य जाति वाले सिर्फ इसकी रफ्तार और सुविधा देखकर आहे भरते रहें। इस चुनाव में आत्मघाती कारण बन सकता है ‘सवर्ण आरक्षण’ पर इनकी पार्टी का स्टेंड। लोकसभा और राज्यसभा में जो रुख राजद ने अख्तियार किया था। उसे अभी तक सवर्ण बिरादरी भूला नहीं है।
दूसरी ओर भाजपा सासंद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल हैं इनके कार्यकाल में सड़को का जाल बिछा, बिजली की स्थित बेहतर हुई, पुल-पुलियों का काम हुआ। जमकर छठ घाटों के निर्माण के लिए राशि आवंटित की गयी लेकिन रोजगार की समस्या जैसी थी वैसी बनी रही। जाहिर है 5 साल सत्ता में रहें कुछ विरोधी भी पैदा किया बड़े घपले का आरोप भी लगा। जातिये समीकरण की बात करें तो इनके साथ सवर्ण, वैश्य तो पहले से था ही नीतीश कुमार का कुर्मी वोट थोक के भाव में मिल सकता है।
तीसरी ओर बसपा प्रत्याशी अनिरुध प्रसाद उर्फ साधु यादव हैं हैं। साधु यादव के मैदान में आते ही विषेशकर राजद के अंदर बेचैनी है। राजद से जुड़े लोग इन्हें वोट- कटवा कह रहें है लेकिन उनके रोड शो में युवाओं और अन्य जातियों की भीड़ कुछ और ही कहानी कह रही है। फिलहाल साधु यादव की बात करें तो ये चुनाव क्षेत्र उनके अनुकूल है। कारण उनके गृह जिला गोपालगंज से महाराजगंज की सीमा लगती है। इन्होंने गोपालगंज में जो विकास का काम किया उससे यहाँ के लोग भी रुबरु हैं। सबसे अहम बात राजद भले ही आज एक बड़ी पार्टी बन गयी है और मौजूदा दौर में पूरी पार्टी पर लालू परिवार का कब्जा हो गया हो लेकिन राजद को इस बुलंदी पर पहुँचाने में कहीं न कहीं से साधु यादव का भी हाथ था। इससे जानने वाले को इंकार नहीं। भले ही साधु का अतीत जैसा हो लेकिन साधु को नजदीक से जानने वाले इस बात का दावा करते हैं और उनसे जुड़ने की अपील करते हैं कि” साधु के करीब जो भी आया जमकर लाभांवित हुआ।” संदेह नहीं पूराने दौर में जिन्होंने इनसे लाभ उठाया वो इस बात को बाखुबी जानते हैं। साधु यादव के लिए सबसे कमजोर पहलू है क्षेत्र में देर से आना यानि उन्हें इतना वक्त नहीं मिला की वो अपने लिए बेहतर कार्यकर्ता ढूंढ सके जो राजद और लोजपा के असंतुष्ट लोगों को वोटों में तब्दील कर सकें। बसपा का आधार वोट इनके साथ दिखता है।

