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Reading: पटेल ना होते तो गिर के शेर, चार मीनार देखने के लिए भी लेना पड़ता वीजा : मोदी
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पटेल ना होते तो गिर के शेर, चार मीनार देखने के लिए भी लेना पड़ता वीजा : मोदी

Last updated: October 31, 2018 12:47 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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केवडिया:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज देशवासियों को विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा की सौगात दी। उन्होंने गुजरात के नर्मदा जिले के केवडिया में देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मी. ऊंची प्रतिमा का उद्घाटन किया। खास बात है कि आज सरदार पटेल की जयंती भी है। आद देश सरदार पटेल की 143वीं जयंती मना रहा है। उद्घाटन समारोह के दौरान पीएम मोदी ने लंबा भाषण भी दिया। उन्होंने अपने भाषण के दौरान सरदार पटेल की उपलब्धियों का जिक्र किया, साथ ही उन्होंने पटेल की प्रतिमा को लेकर विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप भी लगाया। मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत “सरदार पटेल अमर रहे” के नारे के साथ की। उन्होंने कहा कि आज पूरा देश राष्ट्रीय एकता दिवस मना रहा है। देश की एकता और अखंडता के लिए युवा दौड़ रहे हैं। मैं उनके इस जज्बे को मैं नमन करता हूं।
आज का दिन ऐतिहासिक
मोदी ने कहा कि आज जो हुआ वो इतिहास में दर्ज हो गया है और इसे इतिहास से कोई मिटा नहीं पाएगा। आज जब धरती से लेकर आसमान तक सरदार सहाब का अभिषेक हो रहा है तब भारत ने न सिर्फ अपने लिए नया इतिहास रचा है बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा का गगनचुंबी आधार भी तैयार किया है। पीएम मोदी ने आगे कहा ‘सरदार की प्रतिमा को समर्पित करने का अवसर सौभाग्य की बात है। जब मैंने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर इसकी कल्पना की थी, तो अहसास नहीं था कि एक दिन प्रधानमंत्री के तौर पर मुझे ही यह पुण्य काम करने का मौका मिलेगा। सरदार साहब के इस आशीर्वाद के लिए मैं खुद को धन्य मानता हूं।’
मुख्यमंत्री रहते की प्रोजेक्ट की कल्पना
पीएम मोदी ने बताया कि मुख्यमंत्री रहते ही उन्होंने इस प्रोजेक्ट की कल्पना की थी। मोदी ने कहा कि मुझे लोहा अभियान के दौरान लोहे का पहला टुकड़ा भी सौंपा गया है। मैं गुजरात के लोगों के प्रति कृतज्ञ हूं। मैं इन चीजों को यहीं पर छोड़ूंगा, ताकि देश इसे देख सके। उन्होंने कहा कि जब यह कल्पना मन में चल रही थी, तो मैं यहां के पहाड़ों को खोज रहा था।
मेरा विचार था कि नक्काशी कर सरदार साहब की प्रतिमा उस पर निकाली जाए। लेकिन जांच के बाद ऐसी कोई मजबूत चट्टान नहीं मिली। फिर विचार बदलना पड़ा। आज जो रूप आप देख रहे हैं, उसने वहीं से जन्म लिया। इस परियोजना की कल्पना मैंने तब की थी जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। इस प्रतिमा के निर्माण के लिए लाखों किसान साथ आए और अपने औजार और मिट्टी देकर अपने हिस्से का योगदान दिया।
निराशावादियों की किरण थे सरदार पटेल
निराशावादी उस जमाने में भी थे। निराशावादियों को भी लगता था कि भारत अपनी विविधताओं की वजह से बिखर जाएगा। निराशा के उस दौर में भी सभी को एक किरण दिखती है। और यह उम्मीद की किरण थे सरदार वल्लभ भाई पटेल। सरदार पटेल में कौटिल्य की कूटनीति और शिवाजी महाराज के शौर्य का समावेश था। उन्होंने पांच जुलाई 1947 को रियासतों को संबोधित करते हुए कहा था- विदेशी आक्रांताओं के सामने हमारे आपसी झगड़े, दुश्मनी, बैर का भाव हमारी हार की बड़ी वजह थी। अब हमें इस गलती को नहीं दोहराना है। और न ही दोबारा किसी का गुलाम होना है। सरदार साहब के इसी संवाद से एकीकरण की शक्ति को समझते हुए राजा-रजवाड़ों ने अपने विलय का फैसला किया। देखते ही देखते भारत एक हो गया।
सरदार साहब का सामर्थ्य तब भारत के काम आया था जब मां भारती साढ़े पांच सौ से ज्यादा रियासतों में बंटी थी। दुनिया में भारत के भविष्य के प्रति घोर निराशा थी। निराशावादियों को लगता था कि भारत अपनी विविधताओं की वजह से ही बिखर जाएगा। सरदार साहब के इसी संवाद से, एकीकरण की शक्ति को समझते हुए उन्होंने अपने राज्यों का विलय कर दिया। देखते ही देखते, भारत एक हो गया। सरदार साहब के आह्वान पर देश के सैकड़ों रजवाड़ों ने त्याग की मिसाल कायम की थी। हमें इस त्याग को भी कभी नहीं भूलना चाहिए।
..तो अपने देश में घूमने के लिए ही लेना पड़ता वीजा
सरदार साहब ने संकल्प न लिया होता, तो आज गिर के शेर को देखने के लिए, सोमनाथ में पूजा करने के लिए और हैदराबाद चार मीनार को देखने के लिए हमें वीजा लेना पड़ता। सरदार साहब का संकल्प न होता, तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक की सीधी ट्रेन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सरदार साहब का संकल्प न होता, तो सिविल सेवा जैसा प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने में हमें बहुत मुश्किल होती।
इंजीनियरिंग और तकनीकी सामर्थ्य है प्रतिमा
स्टैचू ऑफ यूनिटी हमारे इंजीनियरिंग और तकनीकी सामर्थ्य का भी प्रतीक है। बीते करीब साढ़े तीन वर्षों में हर रोज कामगारों ने, शिल्पकारों ने मिशन मोड पर काम किया है। राम सुतार जी की अगुवाई में देश के अद्भुत शिल्पकारों की टीम ने कला के इस गौरवशाली स्मारक को पूरा किया है। आज जो ये सफर एक पड़ाव तक पहुंचा है, उसकी यात्रा 8 वर्ष पहले आज के ही दिन शुरु हुई थी। 31 अक्टूबर 2010 को अहमदाबाद में मैंने इसका विचार सबके सामने रखा था। करोड़ों भारतीयों की तरह तब मेरे मन में एक ही भावना थी कि जिस व्यक्ति ने देश को एक करने के लिए इतना बड़ा पुरुषार्थ किया हो, उसको वो सम्मान आवश्य मिलना चाहिए जिसका वो हकदार है।

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