पाली-जयपुर। 17 अगस्त 1983 को राजस्थान ने एक ऐसा सपूत खो दिया, जिसकी सोच और संघर्ष आज भी हमारे समाज के लिए प्रेरणा हैं। दीपचंद सोलंकी केवल एक समाजसेवी नहीं थे, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार – गोचर भूमि – के सशक्त रक्षक थे। उनकी दूरदर्शिता और अटूट संकल्प का ही परिणाम था कि 1956 में राजस्थान सरकार ने गोचर भूमि आरक्षण अधिनियम पारित किया, जिससे लाखों पशुपालकों और किसानों की आजीविका सुरक्षित हुई।
वे मानते थे कि जब तक पशुधन सुरक्षित नहीं, तब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। उन्होंने यह भी समझाया कि गोचर भूमि केवल जानवरों के चरने का स्थान नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन और जल संरक्षण का भी महत्वपूर्ण साधन हैं।
छपनिया अकाल जैसे कठिन समय में भी उन्होंने अपने गांव-समाज को संगठित किया, पशुओं और किसानों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था कराई और सरकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाया। उनका संघर्ष किसी पद या लाभ के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए था।
आज, जब गोचर भूमि पर अतिक्रमण और भू-माफियाओं का खतरा बढ़ रहा हैं, दीपचंद सोलंकी की सोच और संघर्ष और भी प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके अधूरे मिशन को पूरा करने का संकल्प लेना हैं।
दीपचंद सोलंकी का जीवन हमें सिखाता हैं कि एक व्यक्ति भी पूरे समाज के भविष्य की दिशा बदल सकता है—बस दृढ़ निश्चय, ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव चाहिए।
पशुधन से पर्यावरण तक: दीपचंद सोलंकी का दूरदर्शी संघर्ष

