शशि शेखर।।
क्या आपने उत्तर भारतीय गांवों में वे रंगरेज देखे हैं, जो सफेद कपड़ों को रंग-बिरंगा करने का पुश्तैनी पेशा संभालते हैं? मनभावन रंगों में रंगे कपडे़ ग्राहकों को सौंपते वक्त वे हिदायत देना नहीं भूलते कि इन्हें गरम पानी से न धोना और धूप में मत सुखाना। ऐसा किया, तो रंग उतर जाएगा।
पिछले आम चुनाव के दौरान मोदी सरकार को दरबदर करने के लिए आनन-फानन में ऐसी ही रंगरेजी की गई थी। चुनाव परिणाम की तपिश ने इसे बदरंग कर दिया। इन नतीजों से हकबकाए क्षेत्रीय दलों के नेता अब अपनी पार्टियों के बदरंग और जर्जर ताने-बाने को नए सिरे से संवारने में जुट गए हैं।
ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है, जहां मायावती ने समाजवादी पार्टी से चुनावी दोस्ती तोड़ ली है। याद करें, छह महीने पहले जब इस तरह के महागठबंधन की चर्चा हवा में थी, तब तमाम राजनीतिक समीक्षकों को लगता था कि यह दोस्ती भाजपा के धुर्रे बिखेर देगी। ऐसा नहीं हुआ। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी पहले की तरह सिर्फ पांच सीटों पर सिमटी रह गई। सबसे बड़ा आघात तो यह रहा कि अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव और चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव तक अपनी सीटें गंवा बैठे। मायावती ने इसी तोहमत के सहारे अपना दामन झाड़ लिया कि जो अपने भाई और पत्नी को न जिता सका, वह भला हमारे वोटों में क्या इजाफा करवा पाएगा?
वैसे तो अधिकांश राजनीतिज्ञ अवसरवादी होते हैं, परंतु मायावती को इसमें महारत हासिल है। ‘बहनजी’ हवाओं के साथ रुख बदल लेती हैं। अतीत में वह समाजवादी पार्टी और भाजपा के साथ सरकार चला चुकी हैं, कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ चुकी हैं। समय के साथ परस्पर विरोधी दल उनके दोस्त बने और समय आने पर रुखसत हो गए।
तय है, उत्तर प्रदेश में 12 विधानसभा सीटों के उप-चुनाव बहुकोणीय होने जा रहे हैं। भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस, रालोद जैसे तमाम राष्ट्रीय और इलाकाई दल इसमें किस्मत आजमाएंगे। सक्षम नेतृत्व, संगठन और सत्ता की धनी भाजपा के लिए यह आदर्श स्थिति है। ये उप-चुनाव 2022 के विधानसभा चुनावों की भी आधारशिला रखेंगे। उत्तर प्रदेश में अगर विपक्ष इसी तरह बिखरता रहा, तो आने वाले दिनों में भी उसे बुरी खबरें सुनने का मन बना लेना चाहिए।
सवाल उठता है कि सपा-बसपा-रालोद का वह गठबंधन फेल क्यों हुआ, जिसने कुछ हफ्ते पहले गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उप-चुनावों में भाजपा को धूल चटाई थी? यही नहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 28.32 और बसपा ने 22.23 फीसदी मत हासिल किए थे। अगर रालोद के वोट भी मिला लें, तो इस गठबंधन के कर्णधारों को उम्मीद थी कि वे कुल मतदान के पचास फीसदी से अधिक हिस्से पर काबिज रहेंगे। हुआ इसका उल्टा। ऊपरी तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि सपा के यादव, बसपा के दलित और रालोद के जाट अपने नेताओं के गठबंधन को स्वीकार नहीं कर सके। साल-दर-साल चली आ रही सामाजिक रंजिश नेताओं के सियासी मिलन से दूर हो भी नहीं सकती थी।
इसी तथ्य के आलोक में आप बिहार और झारखंड के गठबंधनों को देखें। मतदाताओं ने इस चुनाव में ऐसे गठजोड़ों को अंगूठा दिखाकर साबित कर दिया है कि सिर्फ जाति और धर्म की राजनीति अब नहीं चलने वाली। इसकी एक वजह यह भी है कि शिबू सोरेन, लालू यादव, मुलायम सिंह और मायावती जैसे नेताओं को जो लोग स्वाभिमान का प्रतीक मानते थे, उनकी तीसरी पीढ़ी अब मतदाता बन चुकी है। फैसलाकुन युवा पीढ़ी के सरोकार बदल गए हैं और सोच भी। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और रोजगार के सिलसिले में जारी पलायन ने इस प्रवृत्ति पर निरंतर सान चढ़ाई है। 2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान इसका इशारा मिला था, जो 2019 में पूरी तरह पुख्ता हो गया है। अब झारखंड और हरियाणा के अगले विधानसभा चुनाव साबित कर देंगे कि समूह के स्वाभिमान और युवा पीढ़ी के सरोकारों में कौन अधिक बलशाली है?
अगर 2019 दोहराया गया, तो तय मान लीजिए कि जाति, धर्म और क्षेत्रीय गठबंधनों के दिन लदने वाले हैं। अब इलाकाई नेताओं को समूहवादी नारेबाजी की बजाय जनहितकारी कामों का लेखा-जोखा देना होगा, पर विपक्ष का विवेक इसे मानने को तैयार नहीं है। होता, तो बंगाल की ज्वाला-सी धधकने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कांग्रेस और वाम दलों से विधानसभा का अगला चुनाव साथ लड़ने को नहीं कहतीं।
ममता चाहें, तो पड़ोसी ओडिशा से सीख ले सकती हैं। वहां बीजू जनता दल ने लगातार पांचवीं बार चुनावी रण जीता है। नवीन पटनायक गठबंधन नहीं, काम के बूते इस समर में उतरे थे। उनसे पहले तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव ने सफलतापूर्वक इस टोटके को आजमाया था। ओडिशा के पड़ोसी आंध्र प्रदेश का परिणाम काफी कुछ समानता के बावजूद थोड़ा-सा अलहदा है। यहां जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस अथवा भाजपा के बिना चंद्रबाबू नायडू को संघर्ष के बूते बेदखल करने में कामयाबी हासिल की।
इलाकाई क्षत्रप हों या राष्ट्रीय राजनीति के सूरमा, सबको इन चुनावों ने साझा सबक दिया है। सत्तानायकों को अब अपने कामकाज का लेखा-जोखा देना होगा। इसके साथ ही, सत्ता के तलबगार विपक्षी तभी कारगर साबित होंगे, जब उनके पास जगन जैसा संघर्ष और सपने होंगे। मौकापरस्त समझौते अब सफल नहीं होने वाले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तथ्य को समझते हैं। आप यदि उनके दूसरे दौर के पहले 30 दिनों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि इस दौरान उन्होंने संसद के भाषणों के अलावा खुद को सार्वजनिक समारोहों से दूर कर रखा है। वह शुरुआती कुछ दिनों में पिछले दौर के अधूरे कामों को पूरा कर देना चाहते हैं, ताकि मतदाता को समझाया जा सके कि हमें सिर्फ काम से मतलब है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा और राज्यसभा में उन्होंने जो वक्तव्य दिए, वे भी यही साबित करते हैं।
यह ठीक है कि मीडिया के एक बडे़ वर्ग ने कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर उनकी तल्ख चुटकियों को प्रमुखता से छापा, मगर यह भी सच है कि उन्होंने तीन हफ्ते के अपने कामों की सूची भी पेश की। प्रधानमंत्री दूसरे दौर के पहले सौ दिनों में कुछ सार्थक साबित कर आगे की राह प्रशस्त करने में जुटे हैं, जबकि टूटी माला के मनकों की तरह बिखरा पड़ा विपक्ष अभी तक पराजय की धूल झाड़ रहा है।
Thanks:www.livehindustan.com

