मुंबई। देश में पहचान के लिए आधार, पैन, पासपोर्ट, बैंक खाता, बीमा, स्कूल-कॉलेज और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग जगह अलग-अलग हिस्सों में क्यों लिखा जाए? नाम व्यक्ति की पहचान है, कोई ऐसा शब्द नहीं जिसे सॉफ्टवेयर के खाली खाने भरने के लिए मनमाने ढंग से काट दिया जाए।
मशहूर वित्त विशेषज्ञ भरतकुमार सोलंकी का कहना है कि इस समस्या को समझने के लिए पैन कार्ड के आवेदन फॉर्म को ही देख लेना पर्याप्त है। जब किसी फॉर्म में First Name, Middle Name और Last Name के अलग-अलग कॉलम दिए गए हैं और प्रत्येक कॉलम के उपयोग का स्पष्ट प्रावधान है, तो फिर एक ही नाम को अपनी सुविधा से तोड़कर अलग-अलग हिस्सों में लिखने की जरूरत क्यों पड़ती है?
मान लीजिए किसी व्यक्ति का नाम Bharatkumar Deepchand Solanki है। यदि उसकी पारिवारिक पहचान और दस्तावेजों की आवश्यकता के अनुसार इसे Bharatkumar Solanki के रूप में दर्ज करना है, तो यह दो हिस्सों में स्पष्ट रूप से लिखा जा सकता है। लेकिन इसे Bharat Kumar Solanki लिखकर ‘Kumar’ को बीच में डाल दिया जाए तो सवाल पैदा होता है कि आखिर Kumar किसका नाम है? क्या यह पिता का नाम है? क्या यह परिवार का नाम है? या केवल इसलिए बीच में डाल दिया गया कि सॉफ्टवेयर में Middle Name का कॉलम खाली न रह जाए?
यही स्थिति ‘सिंह’, ‘कुमार’, ‘लाल’, ‘मल’, ‘चंद’ जैसे शब्दों को लेकर भी है। यदि किसी व्यक्ति के नाम में ‘सिंह’ उसका वास्तविक पारिवारिक नाम है और वह Last Name है, तो उसे Middle Name बनाकर लिखने का तर्क क्या है? उदाहरण के लिए Manmohan Singh में Singh अंतिम नाम हो सकता है, लेकिन उसे Manmohan Singh के बीच का Middle Name मानकर आगे किसी तीसरे नाम की तरह इस्तेमाल करना नाम की संरचना को ही भ्रमित करता है।
सबसे बड़ा सवाल उन लोगों से है जो पिता का नाम लिखने के बजाय Middle Name में ‘सिंह’, ‘कुमार’, ‘लाल’ या ‘मल’ लिखते हैं। यदि पिता का नाम लिखने में कोई संकोच नहीं है तो उसे स्पष्ट रूप से पिता का नाम लिखिए; और यदि पिता का नाम नहीं लिखना चाहते तो Middle Name खाली छोड़ने में क्या परेशानी है? किसी दूसरे शब्द को पिता के नाम जैसा स्वरूप देकर दस्तावेजों में दर्ज करना भविष्य में परिवार की पहचान और वंशावली के लिए भ्रम पैदा कर सकता है।
भरतकुमार सोलंकी का कहना है कि यह केवल भाषा या व्याकरण का विषय नहीं है। यह डिजिटल प्रशासन और नागरिक पहचान की गंभीर समस्या है। आज एक दस्तावेज में नाम एक तरीके से, दूसरे में दूसरे तरीके से और तीसरे में तीसरे तरीके से दर्ज होता है। फिर बैंक, बीमा, आयकर, पासपोर्ट या संपत्ति के रिकॉर्ड में वही व्यक्ति अपने ही नाम को साबित करने के लिए दस्तावेजों की कतार लेकर घूमता है।
इसलिए अब सवाल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नामकरण प्रणाली की स्पष्टता पर होना चाहिए। क्या सरकार और निजी संस्थानों के सॉफ्टवेयर में ऐसा प्रावधान नहीं होना चाहिए कि नागरिक का नाम अधिकतम तीन निर्धारित हिस्सों—First Name, Middle Name और Last Name—में ही दर्ज हो? और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि एक संयुक्त नाम को कृत्रिम रूप से दो अलग-अलग नामों में बांटने की सुविधा ही समाप्त कर दी जाए।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति की आलोचना करने की नहीं, बल्कि व्यवस्था से एक सीधा सवाल पूछने की है—अगर ‘Bharatkumar’ एक पूरा नाम है तो उसे ‘Bharat Kumar’ बनाने का अधिकार सॉफ्टवेयर या डेटा एंट्री ऑपरेटर को किसने दिया? अगर ‘Singh’ Last Name है तो उसे Middle Name बनाने की जरूरत क्यों है? और अगर Middle Name वास्तव में पिता का नाम है तो उसे पिता के नाम के रूप में स्पष्ट क्यों नहीं किया जाता?
नाम से खिलवाड़ बंद होना चाहिए। नाम व्यक्ति की पहचान है, फॉर्म का खाली कॉलम भरने की सामग्री नहीं। अब समय आ गया है कि स्कूल से लेकर कॉलेज, बैंक, बीमा कंपनी, पैन, आधार और सरकारी विभागों तक एक समान और स्पष्ट नाम-प्रारूप अपनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी को अपने ही नाम की व्याख्या करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
नाम के बीच ‘सिंह’ क्यों? पिता का नाम है या सिर्फ कॉलम भरने की मजबूरी?
Highlights
- मशहूर वित्त विशेषज्ञ भरतकुमार सोलंकी ने उठाया सवाल, नाम को मनमाने ढंग से तोड़ने की प्रवृत्ति पर अब खुली बहस जरूरी

