बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, अलसूर के तत्वावधान में आयोजित आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर कक्षा धर्मसभा में आचार्य पार्श्वचंद्र आदि ठाणा-7 के सान्निध्य में आचार्य श्री जीतमलजी म.सा. का जन्म दिवस तप त्यागपूर्वक मनाया गया| धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री पार्श्वचंद्रजी ने कहा विकार ही विनाश का कारण है| पांचो इन्द्रियों के विषय पर होने वाले राग-द्रेष के कारण ही विकार भाव पैदा होता है| विकारों पर नियंत्रण करना ही साधना का मूल उद्रेश्य है|
प्रात: कालीन कक्षा में पूज्य डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने कहा कि जैन धर्म का उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा कर आत्मा को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करना है। साधक को बाहरी आडंबर से अधिक अंतःकरण की शुद्धि और निर्मल भावों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाप से निवृत्ति ही धर्म है, जबकि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां कर्म हैं। धर्म को केवल खान-पान के त्याग तक सीमित करना उचित नहीं है। वास्तविक धर्म क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का क्षय करना है। उन्होंने चिंतन और चर्या को साधना के दो अनिवार्य आधार बताते हुए कहा कि पुरुषार्थ से ही मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता बन सकता है। वर्तमान में किया गया श्रेष्ठ पुरुषार्थ ही जीवन की दिशा बदलता है।
मुनिश्री ने कहा कि व्यवहार चरित्र से अधिक भाव चरित्र का महत्व है। आत्मा में रमणता ही सम्यक् चारित्र है। क्षमा याचना कर्मबंधन की श्रृंखला को रोकने का प्रभावी साधन है। प्रत्येक प्राणी के प्रति अनुकंपा का भाव रखना चाहिए। यदि प्रत्यक्ष सहायता संभव न हो तो मन, वचन और भाव से भी सहयोग किया जा सकता है। प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने धर्म, कर्म, मिथ्यात्व, देवों के स्वरूप तथा आगमों से संबंधित विभिन्न जिज्ञासाओं का सहज एवं तर्कपूर्ण समाधान किया। धर्मसभा में श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने कहा कि आत्मकल्याण, शांति और मोक्ष का मार्ग इंद्रिय निग्रह, मन के वशीकरण और समभाव से होकर गुजरता है। जब तक मनुष्य अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित नहीं करता, तब तक वह राग-द्वेष और कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो सकता। उन्होंने उत्तराध्ययन सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि जिसने स्वयं पर शासन करना सीख लिया, वही वास्तविक अनुशासित व्यक्ति है। उन्होंने पांचों इंद्रियों के विषयों की चर्चा करते हुए विशेष रूप से रसना संयम का महत्व बताया। भोजन शरीर को चलाने का साधन है, भोग-विलास का माध्यम नहीं। स्वाद के प्रति अत्यधिक आसक्ति ही राग-द्वेष को जन्म देती है। साधक को अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहिए। उन्होंने सेचनक हाथी का दृष्टांत सुनाकर बताया कि जो व्यक्ति स्वयं अनुशासन स्वीकार कर लेता है, उसे बाहरी बंधनों और दंड का सामना नहीं करना पड़ता। महापुरुषों के उपदेशों को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है।
श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने कहा कि जीव के दुःखों का कारण कोई दूसरा नहीं, बल्कि उसका अपना मोह, राग, द्वेष और विशेष रूप से क्रोध है। क्रोध मोहनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होता है और नए कर्मबंध का कारण बनता है। इस चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय क्षमा है। उन्होंने क्रोध के दुष्परिणाम और पूर्व संचित कर्मों के कारण जीव को होने वाले दुःखों का मार्मिक दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि क्रोध सबसे पहले स्वयं का ही अहित करता है। उन्होंने माता-पिता से आह्वान किया कि वे बच्चों को केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कार, परिश्रम और आत्मनिर्भरता की शिक्षा दें। जरूरतमंद को केवल आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे रोजगार और स्वावलंबन का अवसर देना अधिक श्रेष्ठ सेवा है। मुनिश्री ने कहा कि पहले लोग अपने अधिकांश कार्य स्वयं करते थे, जिससे श्रम अधिक होता था और शरीर स्वस्थ रहता था। आज अधिकांश कार्य नौकरों पर निर्भर होने के कारण शारीरिक श्रम कम हो गया है और अनेक बीमारियां बढ़ रही हैं। बाद में स्वास्थ्य के लिए अलग से व्यायाम और वॉक करनी पड़ती है। साधु जीवन स्वावलंबन का श्रेष्ठ उदाहरण है, जहां प्रत्येक साधु अपना कार्य स्वयं करता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने अधीन कार्य करने वाले लोगों के प्रति करुणा, सम्मान और अनुकंपा का भाव रखना चाहिए। अहंकार और स्वार्थ के कारण दूसरों से उनकी क्षमता से अधिक कार्य लेना तथा उन्हें केवल उपयोग की वस्तु समझना धर्म के विपरीत है। अहंकार ही नए कर्मबंध का प्रमुख कारण बनता है। अंत में मुनि श्री ने प्रेरणा दी कि आगमों और महापुरुषों के जीवन-दृष्टांत केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारने के लिए हैं। जब मनुष्य मोह, क्रोध, राग, द्वेष और अहंकार का त्याग कर क्षमा, संयम, समभाव, करुणा और स्वावलंबन को अपनाता है, तभी उसका जीवन आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की दिशा में अग्रसर होता है। आचार्य भगवंत के मुखार बिन्द से आकाश आरती रांका ने सजोड़े 11 उपवास के प्रत्याखयान ग्रहण किए| 16 सती साधना का शुभारम्भ हुआ,जिसमें 90 साधिकाओं ने भाग लिया|
क्रोध, मोह और अहंकार कर्मबंधन के मूल कारण : पूज्य डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.

