नई दिल्ली: देश के चार राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना के विधान सभा चुनाव में जिस तरह से सभी राजनीतिक दलों ने किसानों के कर्ज माफी को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है उससे सरकारी बैंक सकते में हैं। बैंकों की चिंता इस बात को लेकर है कि इस तरह अगर कर्ज माफी की प्रक्रिया चलती रही तो इसका बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर असर होगा। इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक पहले ही चिंता जता चुका है। राजनीतिक मुद्दा होने की वजह से किसी भी सरकारी बैंक ने सामने आकर अभी कुछ नहीं बोला है, लेकिन अलग-अलग बैंक प्रमुखों ने अपनी चिंताओं से वित्त मंत्रालय को अवगत कराया है।
अगर वादे का अमल हुआ तो एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के बैंक लोन हो सकते माफ
वित्त मंत्रालय के साथ पिछले हफ्ते शीर्ष सरकारी बैंकों के प्रमुखों की एक बैठक में कृषि कर्ज माफी का मुद्दा काफी प्रमुखता से उठा। बैंकों की तरफ से बताया गया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से कर्ज माफी की बातें हो रही हैं अगर उन्हें अमल में लाया गया तो कम से कम एक लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने होंगे। यह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब व तमिलनाडु में 80 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी के अतिरिक्त होगी।
वैसे बैंकों को कर्ज माफी की राशि का भुगतान राज्य सरकारों की तरफ से होता है। लेकिन एक बार कर्ज माफी होने से कर्ज वसूली का तंत्र पूरी तरह से अस्थिर हो जाता है। अभी से मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों से यह सूचनाएं आ रही है कि कृषि कर्ज की वसूली बेहद सुस्त हो गई है। कुछ किसानों ने किश्त देना बंद कर दिया है। बैंकों ने यह भी बताया है कि जिन राज्यों में पहले किसानों के कर्ज माफ किये गये हैं वहां भी बैंकों से पूरा हिसाब किताब नहीं हो पाया है।
सरकारी बैंकों की यह चिंता बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक सटीक बैठती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में चुनावों की वजह से 2.7 लाख करोड़ रुपये के कृषि कर्ज माफ किये जा सकते हैं। यह सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी ) का 1.5 फीसद होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस वर्ष जो कर्ज माफी होगी उसका असर अगले वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान तब दिखेगा जब किसान कर्ज लौटना कम कर देंगे।
सनद रहे कि भारतीय रिजर्व बैंक भी इस वर्ष अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कृषि कर्ज माफी को लेकर देश में हो रही राजनीतिक पर परोक्ष तौर पर काफी गंभीर चिंता जता चुका है। इसमें कहा गया था कि कृषि लोन माफ होने से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।
आरबीआइ का डाटा यह भी बताता है कि कर्ज माफी के बावजूद वर्ष 2017-18 में कृषि क्षेत्र में एनपीए 83,153 करोड़ रुपये था जबकि इसके पिछले वर्ष में यह राशि 60,161 करोड़ रुपये थी। जबकि मार्च, 2018 तक बैंकों की तरफ से वितरित कुल कृषि कर्ज की राशि 11,63,253 करोड़ रुपये थी।
कृषि कर्ज माफी को लेकर राजनीतिक दलों का अहम चुनावी एजेंडा बनने से बैंकों में बेचैनी

