नई दिल्ली:सरकार में बड़े बहुमत के साथ वापस आने के साथ नरेंद्र मोदी सरकार उच्च न्याय पालिका में नियुक्तियों के लिए अलग से तंत्र बनाने के कानून एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) को फिर से जीवित करने का प्रयास कर सकती है। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से चार साल पहले 2015 में खारिज कर दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि हमें नहीं लगता कि जजों की नियुक्ति की बुद्धिमत्ता को सरकार के साथ साझा किया जाए देश में सिविल सोसायटी पूरी तरह से विकसित नहीं हुई है, इसलिए नियुक्ति की प्रक्रिया न्यायपालिका के पास ही रहेगी। इस फैसले में एक जज ने नियुक्ति के नए कानून एनजेएसी के पक्ष में अल्पमत का फैसला दिया था। संसद ने इस कानून को 2014 में सर्वसम्मति से पारित किया था और देश की 50 फीसदी विधान सभाओं ने इसे अपनी मंजूरी दी थी। सरकार के लिए यह बहुत बड़ा झटका था।
सूत्रों ने बताया कि सरकार की न्यायपालिका पर तीखी नजर है। पिछले दिनों न्यायपालिका में हुए घटनाक्रमों से सरकार को लगता है एनजेएसी को फिर से लाया जा सकता है। लेकिन इस बार सरकार न्यायपालिका को विश्वास में लेकर इस कानून पर आगे बढ़ेगी। सरकार न्यायपालिका के संशयों को दूर करेगी और नियुक्ति तंत्र को एक स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित करेगी। सूत्रों ने कहा कि पांच साल के बाद न्यायपालिका में नए रक्त का संचार हुआ है और पुरानी सोच के सदस्य रिटायर हो चुके हैं। नई सरकार के गठन के बाद कानून का ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा और कैबिनेट से मंजूरी लेकर संसद में रखा जाएगा।
तंत्र होना जरूरी
सूत्रों ने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायत का एक तंत्र होना जरूरी है। संसद में महाभियोग के जरिये कदाचारी जज को हटाना एक कठिन प्रक्रिया है। क्योंकि महाभियोग प्रस्ताव का दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है। लेकिन यदि ऐसा तंत्र हो जो जांच के बाद कदाचार की गंभीरता के अनुसार सजा दे सकता हो तो महाभियोग की जरूरत नहीं रह जाएगी। महाभियोग चलाने का प्रयोग बेहद गंभीर अपराध में ही किया जा सकेगा।
महाभियोग प्रक्रिया
उच्च न्यायपालिका के जजों को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है। उनके खिलाफ न तो एफआईआर की जा सकती है और न ही कोई जांच।

