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जीवन में रहे जागरूकता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: May 19, 2026 1:06 am
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • ‘प्रमाद कैसे किया जाए?’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित
  • मियामी से गुरु सन्न्धि में पहुंची समणीद्वय ने दी अभिव्यक्ति, मिला मंगल आशीष

लाडनूं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आज के निर्धारित विषय ‘प्रमाद कैसे किया जाए?’ का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन में जीवों को अनेक चिंताएं होती हैं। सबसे पहले उसे चिंता आहार और पानी की होती है। जीवन को चलायमान रखने के लिए भोजन और पानी प्रथम कोटि की आवश्यकता होती है। आहार-पानी की चिंता साधारण जीव हो, मानव हो अथवा साधु ही क्यों न हो, आहार-पानी की आवश्यकता तो सभी को होती है। गृहस्थ जीवन है तो उसे भोजन-पानी की व्यवस्था के बाद रहने के लिए मकान की आवश्यकता भी होती है। गृहस्थ को घर चाहिए। स्वयं के घर की अपेक्षा भी होती है। घर हो गया तो उसे तन ढकने के लिए कपड़े ही आवश्यकता होती है। फिर आदमी को आभूषण, परिवार, बच्चे आदि-आदि की अपेक्षाएं महसूस होती हैं।
कोई-कोई गृहस्थ ऐसे भी विचार करते हैं कि घर तो हो गया, लेकिन मेरे स्वामित्व में दुकान नहीं है। हाथ में सोने की अंगूठी तो हो गई, लेकिन गले में स्वर्ण का चैन नहीं है। इस प्रकार गृहस्थ तमाम चिंतन करता रहता है कि यह मेरे पास है, यह मेरे पास नहीं है। इसी प्रकार कोई राजनीतिक व्यक्ति है तो वह सोचता है कि मैं विधायक बन गया, लेकिन मुझे अब सांसद बनना है। गृहस्थ का चिंतन ऐसा हो जाता है कि यह तो है, लेकिन यह नहीं है। इसी प्रकार वह अपने करणीय और करणीय कार्यों का भी चिंतन करता है। आदमी में यदि नैतिकता के भाव हैं तो वह पैसा कमाने में ईमानदारी रख सकता है, किन्तु जिसमें नैतिकता के भाव पुष्ट न हों तो वह भला कमाई में कितनी ईमानदारी दिखा सकता है। बेइमानी से भी पैसा कमाने का चिंतन सामान्य आदमी कर सकता है। सांसारिक आदमी ऐसे वार्तालापों में आदमी लगा रहता है। ऐसी बातों का चिंतन करने वाले लोगों को कभी मृत्यु हरण कर ले जाती है।
आदमी को अपने जीवन में प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। उसका चिंतन भी अच्छे रूप में होना चाहिए कि अधिक से अधिक धर्म ध्यान, साधना, स्वाध्याय करने का प्रयास होना चाहिए। यह आगम पढ़ लिया हूं और दूसरा आगम पढ़ने का प्रयास हो। सभी को अपने जीवन में जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जिस क्षेत्र में जिसकी गति हो, उस क्षेत्र में उसे अच्छा करने का प्रयास होना चाहिए। जिस क्षेत्र में सेवा दी जा सकती है, उस क्षेत्र में सेवा देने के प्रति जागरूक रहना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि यह योगक्षेम वर्ष चल रहा है। क्या-क्या हुआ योगक्षेम वर्ष में, यह जब कोई भविष्य में पूछे तो उसका क्या जवाब होगा, उसके लिए कुछ सामग्री को एकत्रित करने का प्रयास होना चाहिए। कौन-कौन सी क्लास चली, कैसे प्रशिक्षण हुआ, कौन-कौन प्रशिक्षक आए, अमुक गोष्ठी, अमुक निर्णय आदि सामग्री को एकत्रित करने का प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि भरतकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मियामी से गुरु सन्निधि में पहुंची समणी प्रतिभाप्रज्ञाजी व समणी पुण्यप्रज्ञाजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। समणीजी ने गीत का संगान भी किया। आचार्यश्री ने समणीद्वय को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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