02.09.2026, बुधवार, लाडनूं। जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आज के निर्धारित विषय ‘श्रुताराधना से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि साधना पद्धति में श्रुत की आराधना का भी महत्त्व है। आगमों के माध्यम से इस संदर्भ में निर्देश भी प्राप्त होते हैं। चार प्रहर में स्वाध्याय का निर्देश है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की साधु परंपरा में प्रतीकात्मक रूप में चार काल के स्वाध्याय की बात भी बताई जाती है। ये चार प्रहर के स्वाध्याय का न्यूनतम रूप है। आदमी को सदा स्वाध्याय में रत रहने का प्रयास करना चाहिए।
श्रुत, ज्ञान व आगम की आराधना की जा सकती है। चाहे गृहस्थ हो अथवा साधु, सभी के लिए ज्ञान का महत्त्व होता है। बच्चे देश ही पढ़ने के लिए विदेशों में भी जाते हैं। कितने-कितने शिक्षण संस्थाएं आदि इस कार्य में लगी रहती हैं। भारत में भी अपने निवास स्थान से बाहर जाकर पढ़ाई करने वाले करते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि गृहस्थों में भी पढ़ाई के प्रति, ज्ञान के प्रति विशेष आकर्षण नजर आता है। साधु समुदाय में श्रुत का अपना महत्त्व है। आगम की आराधना अथवा अन्य पठनीय साहित्य व पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान की आराधना की जा सकती है। श्रुत की आराधना करने से अज्ञानता का नाश होता है। अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान रूपी प्रकाश की आवश्यकता होती है। जब ज्ञान रूपी प्रकाश फैलता है तो अज्ञान रूपी अंधकार स्वतः दूर हो जाता है। आदमी को जीवन में ज्ञान का दीपक जलाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को श्रुताराधना कर अपने जीवन को ज्ञान के प्रकाश से भावित बनाने का प्रयास करना चाहिए। श्रुत की आराधना करने से आदमी श्रुत की आराधना करता है।
श्रुत की आराधना से आंतरिक प्रसन्नता का भी विकास हो सकता है। जैसे साधु श्रुत में अवगाहन करता है, वैसे-वैसे मुनि को प्रसन्नता की प्राप्ति हो सकती है। श्रुत भी समाधि का कारण बन सकता है। स्वाध्याय करने वाले के भीतर प्रसन्नता की अनुभूति हो सकती है। जितना समय मिले, स्वाध्याय करने का प्रयास करना चाहिए।
श्रुत की आराधना करने वाला राग-द्वेष के भावों से भी बच सकता है। राग-द्वेष के कारण वह दुःखी नहीं बनता। श्रुत की अवगाहन करने से दृष्टिकोण अच्छा हो सकता है, चिंतन अच्छा हो सकता है। जिस आदमी का चिंतन अच्छा हो जाता है, वह दुःखों से भी पार पा सकता है। चिंतन अच्छा हो तो आदमी शांति में भी रह सकता है। अपने ज्ञान का अच्छा सदुपयोग भी करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार यथायोग्य सभी को श्रुत में अवगाहन करने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के भी उत्तर प्रदान किए। श्री कर्णसिंह जैन ने अपनी पुस्तक ‘साधना के स्वर’ को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

