मुंबई। आचार्य रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार में आज प्रवचन में ललितशेखरविजयजी म. सा. ने ‘दूसरी सिद्धों की शरण’ के बारे में बताया और बेसता महीने का मांगलिक भी सुनाया। प्रत्येक आत्मा का मायका निगोद और ससुराल मोक्ष (सिद्धों का निवास) होता हैं, आत्मा निगोद से निकलकर मोक्ष तक पहुचने के बीच के सफर में अनंत भवों में अनंत काल के लिए भटकती रहती हैं। जब आत्मा के आठों कर्म खप जाते हैं तब मोक्ष प्राप्त होता हैं और आत्मा सिद्ध परमात्मा बनती हैं, पर अरिहंत के सिर्फ 4 कर्म खपे होते हैं। जब कोई आत्मा सिध्द होती हैं तब निगोद से 1 आत्मा कर्म सत्ता में आती हैं इसलिए आत्मा का प्रथम उपकारी सिद्धात्मा होती हैं, और अरिहंत परमात्मा का आलंबन लेकर हमें मोक्ष की प्राप्ती करनी हैं इसलिए वो परम उपकारी होते हैं। आराधना और साधना मोक्ष की प्राप्ति के लिए होती हैं, मोक्ष में कोई संयोग, पदार्थ प्रवृति, आदि नहीं होती हैं पर आत्मा को कभी ना खत्म होने वाला अनंत सुख का आनंद होता हैं, सिद्धों का कण भर का सुख भी पूरे चौद राजलोक के अनंत सुख से अनंत गुना ज्यादा होता हैं।
धर्मास्तिकाय तत्व आत्मा को गति देने में और अधर्मास्तिकाय तत्व आत्मा को स्थिर रहने में सहायक होता हैं। जितना साँप का डर हैं उतना पाप का डर नहीं हैं, साँप के काटने से 1 भव बिगड़ेगा, पर संसार रूपी साँप के काटने से भवों भव बिगड़ेंगे, जिसको संसार का डर होता हैं उसे ही मोक्ष प्राप्ती की इच्छा होती हैं और सिद्धों की शरण में जाने के लिए संसार का डर होना जरूरी हैं। जितनी धन-संपत्ति की चिंता रहती हैं उतनी आत्मा को सद्गति मिले वो चिंता नहीं रहती हैं। सुख की चाह में हम यहां वहां भटक-भटक के मर रहे हैं पर वो सच्चा सुख नहीं हैं सिर्फ सुख का आभास हैं, और वो दया पात्र हैं और दूसरा हम सुख के अभाव में मरते हैं, अभाव को भाव में बदला जा सकता हैं पर आभास का कोई इलाज नहीं हैं।
सिद्धों के पास 4 तरह का सुख होता हैं, 1. प्योर सुख, 2. पर्सनल सुख, 3. परफेक्ट सुख और 4. परमानेंट सुख। हम सुख से जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं के अचानक दुख आ जाता हैं और हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं, ये दुखमय संसार हैं यहां सुख मिलने पर आश्चर्यचकित होना चाहिए।
1 चींटी की दृष्टांत से हमारी आत्मा के संदर्भ में समझाया के चींटी मायके से ससुराल जा रही हैं, पता नहीं कब पहुचेगी क्योंकि चींटी का कण भर का शरीर, 100 मण जितना संसार का भार उठाये, गोद में हाथी को बिठाए और ऊंट को शरीर पे लपेटे हुए जा रही हैं, हाथी अहंकार और अभिमान का प्रतीक है और ऊंट के 18 अंग टेढ़े होते हैं वैसे ही हमनें 18 पापस्थानक का आवरण हमारी आत्मा पे ओढ़ रखा हैं, ऐसे में हमारी आत्मा का कल्याण कैसे होगा ?
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार इस मौके पर ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ताओं के अलावा बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही।
जब आत्मा के आठों कर्म खप जाते हैं तब मोक्ष प्राप्त होता हैः ललितशेखर विजयजी महाराज

