नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया कि अगर कोई शख्स हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से बाहर जाकर धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। आंध्र प्रदेश के एक पादरी से जुड़े मामले में आए फैसले के व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं।शीर्ष अदालत के फैसले का आधार Constitution (Scheduled Caste) Order, 1950 है। इस आदेश का क्लॉज 3 कहता है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले ही SC श्रेणी में आ सकते हैं। धर्म परिवर्तन और जाति से जुड़ी यह बहस बहुत पुरानी है। इसके दो पहलू हैं। एक, जिन धर्मों में जाति व्यवस्था नहीं है, उन्हें अपनाकर फिर जाति से जुड़े लाभ कैसे लिए जा सकते हैं। पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया था कि जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्होंने SC से जुड़े लाभ छोड़ दिए हों।
तब हाईकोर्ट ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी SC कम्युनिटी को मिलने वाले फायदे लेते रहना संविधान के साथ धोखा है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास इस तरह की कई शिकायतें हैं और उसने पिछले साल देशभर में जांच भी शुरू की थी। कुल मिलाकर मंशा यह है कि संविधान के तहत मिले अधिकार का दुरुपयोग न होने पाए।हालांकि देश में जाति से जुड़ा सवाल बहुत टेढ़ा है। सामाजिक स्तर पर हमेशा से यह बहस का विषय रहा है कि क्या धर्म बदलने भर से जातिगत भेदभाव खत्म हो जाता है? ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें दलित समुदाय के लोगों को दूसरा धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ा। पिछले साल मार्च में ही तमिलनाडु के कुछ ईसाई परिवारों, जो पहले दलित थे, ने आरोप लगाया था कि उनके साथ समान व्यवहार नहीं होता। यहां तक कि कब्रिस्तान में उनके लोगों के शवों को दफनाने के लिए भी अलग जगह है।
राजनीतिक नजरिये की बात करें तो इस फैसले के बाद धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़ी बहस जोर पकड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर तौर पर संविधान के आलोक में फैसला दिया है, लेकिन कुछ मसले ऐसे होते हैं जहां कानून और जमीनी हकीकत आमने-सामने आ जाते हैं। भारत में जाति एक सच्चाई है, जिसे नहीं बदला जा सकता, लेकिन इससे जुड़ी बुराइयों को खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए।
हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से बाहर जाकर धर्म परिवर्तन किया तो नहीं मिलेगा आरक्षण

