कलाकारः भूमि पेडणेकर, तापसी पन्नू, प्रकाश झा, विनीत कुमार आदि
निर्देशकः तुषार हीरानंदानी, निर्माताः अनुराग कश्याप, रिलायंस इंटरटेनमेंट व निधि परमार।
इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में बायोपिक बनाने का ट्रेंड है। बीते सालों में कुछ बायोपिक ऐसी बनीं जो वाकई में पिछली पीढ़ी के लिए सबक तो आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी हैं। इन्हीं में से एक फिल्म है ‘सांड की आंख’। भूमि पेडणेकर, तापसी पन्नू एवं प्रकाश झा की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की रहने वाली दो शूटर बहुओं चंद्रो और प्रकाशी तोमर के जीवन पर आधारित है। यह फिल्म उस समय की कहानी कहती है जब औरतों का पिस्तौल चलाना तो दूर सिलाई मशीन तक चलाना घर के पुरुषों को गंवारा नहीं होता था। ऐसे में चंद्रो और प्रकाशी ने घरवालों से चोरी चुपके शूटिंग करके कई मेडल अपने नाम कर लिया था और बाद में जब परिवार के मर्दों को पता चला तो तमाम बखेड़ा खड़ा हो गया। इन्हीं दोनों महिलाओं के संघर्षों की कहानी है सांड़ की आंख। फिल्म का नाम ‘सांड़ की आंख’ अंग्रेजी में निशानेबाजी में इश्तेमाल होने वाले शब्द ‘बुल्स आई’ से लिया गया है।
कहानीः चंद्रो (भूमि पेडणेकर) और प्रकाशी (तापसी पन्नू) दोनों ऐसे परिवार की महिलाएं हैं जहां पुरुषों की इजाजत के बिना पत्ता तक नहीं हिलता तथा महिलाओं को तो वही करना पड़ता है जितना घर के बड़े इजाजत दें। दोनों महिलाएं सोचती हैं कि हमारी जिंदगी तो जैसे-तैसे गुजर गई लेकिन हम अपनी बेटी व पोती की जिंदगी ऐसे नहीं गुजरने देंगे। उन्हें उड़ने के लिए आसमान देंगे। हमारे नाखून भले ही हमेशा गोबर से सने रहे लेकिन बेटियों के लिए नाखून पालिस लगाने के लिए जरूर लड़ेंगे। दोनों अपनी घर की बेटियों को निशानेबाजी सिखाने के लिए गांव के ही एक व्यक्ति के पास जाती हैं, जिसे देखकर लोग हंसते हैं लेकिन जब वह निशानेबाजी करती हैं तो सभी भौचक रह जाते हैं। जाती तो हैं बेटियों को शूटिंग सिखाने लेकिन उनका खुद का निशाना इतना सटीक लगता है कि खुद ही निशानेबाजी करने लग जाती हैं। साथ ही बेटियों को भी ट्रेनिंग दिलवाती हैं। धीरे-धीरे वे प्रतियोगिताओं में भी भाग लेने लगती हैं और मेडल भी जीतती हैं। इस दरम्यान घर के बड़े (प्रकाश झा) को यह सब पता चल जाता है जिसे लेकर घर में काफी बवाल होता है। दोनों महिलाओं को किन-किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है? वे अपने बेटियों को शूटिंग में मुकाम दे पाती हैं कि नहीं? उन्हें शूटिंग के ट्रेनिंग देने वाले की क्या दशा होती है, यह सब फिल्म में बहुत ही बढ़िया अंदाज में फिल्माया गया है। उस वक्त को दर्शाने के लिए निर्देशक ने काफी मेहनत की है, जो साफ दिखाई देता है। कुल मिलाकर यह फिल्म प्रेरणादायी व बेहतरीन बायोपिक बन पड़ी है, जिसे हर किसी को सपरिवार देखना चाहिए।
अभिनय/निर्देशनः भूमि और तापसी इस उम्र में बुजुर्ग दादियों की भूमिका में अच्छी लगी हैं। फिल्म में भूमि तापसी पर भारी पड़ गई हैं बावजूद इसके दोनों की ही एक्टिंग लाजवाब है। प्रकाश झा ने कोशिश तो बढ़िया की है लेकिन कई जगह काफी कमजोर नजर आए हैं। उनका डायलॉग डिलीवरी जैसा होना चाहिए, वैसा बन नहीं पाया है। विनीत कुमार ठीक लगे हैं। तुषार हीरानंदानी का निर्देशन बढ़िया बन पड़ा है, इसी वजह से फिल्म भी अच्छी बन गई है। फिल्म में बाकी कलाकारों को करने के लिए कुछ खास नहीं था, क्योंकि यह दो महिलाओं की बायोपिक है और निर्माताओं ने भूमि पेडणेकर और तापसी पन्नू जैसी बेहद अच्छी एक्ट्रेस को कास्ट किया था। दोनों ही पूरी फिल्म में छाई हुई हैं।
संगीतः इस फिल्म में गीत संगीत कोई खास मायने तो नहीं रखता है लेकिन जितना भी है वह सामान्य है।
कुल मिलाकर यह प्रेरणादायी व दो महिलाओं के मजबूत संघर्ष की कहानी कहने वाली फिल्म ‘सांड़ की आंख’ एक बार जरूर देखें वह भी परिवार के साथ।
सुरभि सलोनी की तरफ से 4 स्टार।
- दिनेश कुमार [email protected]

