निर्माताः किशोर सवलानी, निर्देशकः जाबिर अली
कलाकारः आर्यन सिंह, साहेबा पिरानी, मुश्ताक खान, बीरबल, नरेंद्र बेदी आदि
‘लाफ्टर के चाप्टर’ एक फिल्म राइटिंग का शौक रखने वाले लेखक की कल्पना है, जो एक फिल्म सोचता है जिसमें एक गैंगस्टर, और कई डाकुओं के खाने के लाले पड़ गए, अचानक उनका धंधा बंद हो गया और वे हीरे के लालच में एक जगह जाकर फंस जाते हैं, लेकिन बाद में उनकी सच्चाई जानने के बाद पुलिस भी हैरान हो जाती है। इसी में निर्माता, निर्देशक व फिल्म राइटर द्वारा लाफ्टर परोसने का प्रयास किया गया है।
कहानीः एक उभरते हुए फिल्म राइटर की कहानी है जो डरावने नॉवेल पढ़ता है। कुछ गली नुक्कड़ के टपोरी लोगों के पास अचानक 50 करोड़ रुपए आ जाते हैं और वे फिल्म बनाने के लिए राइटर के पास जाते हैं। राइटर खुश होकर बताता है कि कहानी उनके पास है, उस पर बहुत अच्छी फिल्म बन सकती है और वह कहानी है डॉन साउद भाई, चंदन तस्कर वीरप्पन, डाकू गब्बर सिंह, बीहड़ का डाकू गुज्जर सिंह की, जिनका काम अचानक बंद हो गया और वे कंगाल हो गए। उन्हें मधुबाला एक घर पर साजिश के तहत हीरों का लालच देकर बुलाती है और बताती है कि मैं फूलन देवी हूं और अपने ब्वायफ्रेंड का परिचय विक्रम मल्लाह के रूप में करवाती है। इस घर में कहीं हीरा छुपा है और तुम सबने ढूंढ लिया तो सबको बराबर-बराबर हिस्सा मिलेगा। बुरे दौर से गुजर रहे सभी उसकी बातों में आकर हीरे ढूंढ़ते हैं और आखिर में मिल भी जाता है लेकिन अंत में वे एक साजिश में फंस जाते हैं। वे कंगाल होने के बाद अपने ठिकाने पर कैसे जीवन बिताते हैं, उनके साथ क्या-क्या घटता है, अंत में फंसने के बाद कहानी में क्या मोड़ आता है, यह सब जानने के लिए आपको एक बार फिल्म देखना पड़ेगा।
निर्देशन/अभिनय/संगीत: निर्देशक जाबिर अली के निर्देशन पर टिप्पणी करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन उनके फिल्म की कल्पना बड़ी अच्छी लगी। फिल्म को लाफ्टर से भरा जा सकता था लेकिन इसमें वे पूरी तरह नाकाम रहे। फिल्म कहीं से भी लाफ्टर पैदा करने में नाकाम रही है, जिसकी वजह कमजोर निर्देशन, कमजोर अभिनय को ही माना जा सकता है। लोकेशन ठीक-ठाक हैं लेकिन अभिनय में सभी नाकाम साबित हुए। निर्देशक ने फिल्म में मुश्ताक खान, बीरबल जैसे कलाकारों का पूरी तरह से दुरुपयोग हो गया है। फिल्म के नायक आर्यन सिंह, नायिका साहेबा पिरानी का अभिनय भी अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा है। अगर बात संगीत की करें तो फिल्म में एक आयटम नंबर अंतिम में फिल्माया गया है, जो भोजपुरी फिल्मों की याद दिलाता है। कुल मिलाकर फिल्म एक बार देख सकते हैं लेकिन यह आपका कितना मनोरंजन कर पाएगी, यह गारंटी मैं नहीं ले सकता। चाहें तो अपने रिस्क पर फिल्म देख सकते हैं।
हमारी तरफ से फिल्म को 2.5 स्टार।
– दिनेश कुमार ([email protected])

