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छठ के दूसरे दिन होता है खरना

Last updated: November 1, 2019 11:06 am
Surabhi Saloni
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3 Min Read
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लोक आस्था का महापर्व छठ ज्यादातर उत्तरप्रदेश और बिहार-झारखंड में बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस बार छठ का पर्व 31 अक्टूबर से नहाय खाय के साथ शुरू हो चुका है। इस व्रत में नदी, तालाब में जाकर भीगे देह से सूर्य भगवान की उपासना की जाती है। साथ ही प्रसाद में मौसमी फल, सब्जियां और अनाज का उपयोग किया जाता है। आज व्रती छठ का दूसरा दिन खरना करेंगे। छठी मइया को प्रसन्न करने के लिए आज हर व्रती प्रसाद में चार चीजें जरूर रखता है। आइए जानते हैं आखिर क्या हैं ये चार चीजें।

खरना के प्रसाद में शामिल होती हैं ये चार चीजें-
छठ के दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन व्रती सुबह से निर्जला व्रत रखकर शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर बनाती है। खीर के साथ रोटी भी बनती है। रोटी और खीर को मौसमी फल जिसमें केला जरूर शामिल किया जाता है और मिठाई के साथ एक केले के पत्ते पर रखकर इस प्रसाद को छठ माता को चढ़ाती हैं। इसके बाद व्रती खुद भी इस प्रसाद को ग्रहण करके परिवार के बाकी लोगों को भी प्रसाद बांटती है। बता दें, यह प्रसाद चूल्हें पर आम की लकड़ियों में ही बनाया जाता है।

क्या होता है खरना-
सूर्य उपासना का यह लोकपर्व छठ 4 दिनों तक मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत नहाय-खाय से होती है। अगले दिन खरना किया जाता है। खरना का मतलब होता है शुद्धिकरण। दरअसल, छठ का व्रत करने वाले व्रती नहाय खाय के दिन पूरा दिन उपवास रखकर केवल एक ही समय भोजन करके अपने शरीर से लेकर मन तक को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। जिसकी पूर्णता अगले दिन होती है। यही वजह है कि इसे खरना के नाम से बुलाया जाता है। इस दिन व्रती साफ मन से अपने कुलदेवता और छठ मैय्या की पूजा करके उन्हें गुड़ से बनी खीर का प्रसाद चढ़ाते हैं। आज के दिन शाम होने पर गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद बना कर बांटा जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

खरना का धार्मिक महत्व-
खरना के दिन जो प्रसाद बनता है, उसे नए चूल्हे पर बनाया जाता है और ये चूल्‍हा मिट्टी का बना होता है। चूल्‍हे पर आम की लकड़ी का प्रयोग करना शुभ माना जाता है खरना इसलिए भी खास है क्‍योंकि इस दिन जब व्रती प्रसाद खा लेती हैं तो फिर वे छठ पूजने के बाद ही कुछ खाती हैं।

खरना के बाद आसपास के लोग भी व्रतियों के घर पहुंचते हैं और मांगकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। गौरतलब है कि इस प्रसाद के लिए लोगों को बुलाया नहीं जाता बल्कि लोग खुद व्रती के घर पहुंचते हैं।

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