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Reading: भारतीय महिलाओं के हक अधिकारों के जनक डॉ. बाबा साहेब भीम राव अंबेडक़र
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भारतीय महिलाओं के हक अधिकारों के जनक डॉ. बाबा साहेब भीम राव अंबेडक़र

Last updated: April 15, 2020 7:06 am
Surabhi Saloni
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16 Min Read
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भारतीय महिलाओं के हक अधिकारों के जनक
डॉ. बाबा साहेब भीम राव अंबेडक़र

भारतीय संविधान के निर्माता, इस देश के दबे-कुचले मजलूमों, गरीबों, शोषित-पीडि़त लोगों के रहनुमा, आधी आबादी याने महिलाओं के हक अधिकारों के पेरोकार डॉ. बाबा साहेब भीम राव अंबेडक़र की 14 अप्रैल को जयंती है। इस अवसर पर उनके व्यक्तित्व व कतिृत्व से जुड़े कुछ पहलुओं पर नजरें इनायत करते है।
इस मौके पर सबसे पहले इसी पर बात करते है कि आखिर वे चाहते क्या थे? उनकी हमसे अपेक्षाएं क्या थीं? यह सब जाने और समझे बिना डॉ. आंबेडकर को समझ पाना मुश्किल है। वे क्या है। उनका दर्शन क्या है, ये जानने समझने के पहले हमें यह भी समझना होगा कि क्या वे केवल दलितों के हक अधिकारों के ही पेरोकार थे। कह सकते है नही। जीवन में उनने जितना काम दलितों के लिए किया उससे कहीं अधिक पिछड़ा वर्ग के लोगों के उत्थान और बेहतरी के लिए किया।
आज तक उनके व्यक्तित्व को लेकर जो पेश किया गया वह केवल दलित-आदिवासियों के उत्थान के रूप में पेश किया गया। या फिर ब्राहम्णों का विरोधी बताया गया। असल में ऐसा कुछ था ही नही। गर वो ब्राहम्ण विरोधी होते तो उस वर्ग की महिलाओं के कल्याण व उत्थान के लिए कोई काम क्यूं करते। यह उनका दूर्भाग्य ही कहें कि आज तक उन्हे राजनीतिक और धार्मिक कट्टरपंथी लोगों ने केवल दलितों का हितैषी बताया बल्कि ब्राहम्णों का विरोधी बता कर उनके सामाजिक दायरे को सीमित कर दिया।
असल में वे इस देश की आधी आबादी याने महिलाओं के लिए किसी खुदा से कम नही थे। महिलाओं के कल्याण और उत्थान के लिए उनने जाति, धर्म की संकुचित बेडिय़ों को तौडक़र जो काम किया है वह काम न उस समय के नेता कर पाते और न ही आज के नेता।
महिलाओं की स्वतंत्रता व समानता के संबंध में वे अक्सर कहा करते थे कि- सही मायने में असली प्रजातंत्र तब आयेगा, जब महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें घर परिवार में पुरुषों के बराबर अधिकार दिये जायेंगे। दरअसल वह इस देश की महिलाओं के हक अधिकारों के लिए सच्ची लड़ाई के पक्षधर थे।
वे एकमात्र ऐसे इंसान थे जो महिलाओं को हक दिलाना चाहते थे। वे दलितों से कहीं अधिक महिलाओं की उन्नति के पक्षधर थे। उनका मानना था कि किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि महिलाएं उस समाज में कितनी स्वतंत्र और अधिकार संपन्न है।
वे स्पष्ट कहते थे कि दुनिया की करीब आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए जब तक उनका समुचित विकास नहीं होता, कोई भी देश चहुंमुखी विकास नहीं कर सकता। डॉ. आंबेडकर का महिलाओं के संगठन में भी खासा विश्वास था। वे कहते थे कि यदि महिलाएं एकजुट हो जाएं तो समाज को सुधारने के लिए क्या नहीं कर सकती हैं? वे लोगों से कहा करते थे कि महिलाओं और अपने बच्चों को शिक्षित कीजिए। उन्हें महत्वाकांक्षी बनाइए। उनके दिमाग में यह बात डालिए कि महान बनना उनकी नियति है। महानता केवल संघर्ष और त्याग से ही प्राप्त हो सकती है।
आजादी के बाद भारत का संविधान बनाने में जुटी संविधान सभा के सामने 11 अप्रैल 1947 को डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल पेश किया। इस बिल में बिना वसीयत किए मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले हिंदू पुरुषों और महिलाओंं की संपत्ति के बंटवारे के संबंध में कानूनों को संहिताबद्ध किए जाने का प्रस्ताव था। यह विधेयक न केवल महिलाओं के हक अधिकारों का पेरोकार था बल्कि उन्हें कई प्रकार की स्वतंत्रता, समानता और सम्मान दिलाने का भी पक्षधर था।
वे संविधान में सभी नागरिकों के, उनमें महिलाएं भी आती है, को बराबरी का हक दिया। संविधान के अनुच्छेद 14 में यह प्रावधान किया कि किसी भी नागरिक के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसी कारण आजादी मिलने के साथ ही महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार भी देखा गया। आजाद भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए कई कदम उठाए। ये भी जाने कि उनने वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य रहते हुए पहली बार महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश (मैटरनल लिव) की व्यवस्था की।
हालाकि महिला उत्थान के लिए किए गए कामों में कई उल्लेखनीय कार्य है लेकिन सबसे बड़ा काम हिंदू कोड़ बिल है।
उस समय हिंदु कोड़ किल का कट्टरपंथियों ने खासा विरोध किया था। आज जैसे तीन तलाक में बदलाव की मांग को कट्टरपंथी धड़ा इस्लाम में दखल बताता है, कुछ वैसा ही आजादी के बाद हिंदू रूढिय़ों में बदलाव किए जाने पर अतिवादियों ने उसे हिंदू धर्म पर हमला करार दिया था।
आपको यह जानकर हैरानी होगी जब भारत आजाद हुआ तब हिंदू समाज में पुरुष और महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं था। पुरूषों को एक से ज्यादा शादी करने की आजादी थी लेकिन विधवाएं दोबारा शादी नहीं कर सकती थी। विधवाओं को संपत्ति से भी वंचित रखा गया था। यह विधेयक मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार देता था।
इस विधेयक में विवाह संबंधी प्रावधानों में भी बदलाव किया गया था। यह दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था-सांस्कारिक व सिविल। इसमें हिंदू पुरूषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध और अलगाव संबंधी प्रावधान भी थे। यह कहा जा सकता है कि हिंदू महिलाओं को तलाक का अधिकार दिया जा रहा था।
यह बिल ऐसी तमाम कुरीतियों को हिंदू धर्म से दूर कर रहा था जिन्हें परंपरा के नाम पर कुछ कट्टरपंथी जिंदा रखना चाहते थे। इसका जोरदार विरोध हुआ। इस बिल के समर्थन में डॉ. आंबेडकर के तमाम तर्क बेअसर साबित हुए। इस बिल को 9 अप्रैल 1948 को सेलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया गया। बाद में 1951 को आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल को संसद में पेश किया। इसे लेकर संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक आंबेडकर के विरोधी हो गए।
लेकिन डॉ. आंबेडकर कहा करते थे कि मैं हिंदू कोड बिल पास कराकर भारत की समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहता हूं। मैंने हिंदू कोड पर विचार होने वाले दिनों में पतियों द्वारा छोड़ दी गई अनेक युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को देखा है। उनके पतियों ने उनके जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्र का चार-पांच रुपये मासिक गुजारा बांधा हुआ था।
वे औरतें ऐसी दयनीय दशा के दिन अपने माता-पिता, या भाई-बंधुओं के साथ रो-रोकर व्यतीत कर रही थीं। उनके अभिभावकों के हृदय भी अपनी ऐसी बहनों तथा पुत्रियों को देख-देख कर शोकसंतप्त रहते थे। बाबा साहेब का करुणामय हृदय ऐसी स्त्रियों की करुण गाथा सुनकर पिघल जाता था।
लेकिन हिंदू कोड बिल का विरोध करने वालों का कहना था कि यह कानून सिर्फ हिंदुओं के लिए क्यों लाया जा रहा है, बहु विवाह की परंपरा तो दूसरे धर्मों में भी है। इस कानून को सभी पर लागू किया जाना चाहिए। यानी समान नागरिक आचार संहिता।
संसद में जहां जनसंघ समेत कांग्रेस का हिंदूवादी धड़ा इसका विरोध कर रहा था तो वहीं संसद के बाहर हरिहरानन्द सरस्वती उर्फ करपात्री महाराज के नेतृत्व में बड़ा प्रदर्शन चल रहा था। अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना करने वाले करपात्री का कहना था कि यह बिल हिंदू धर्म में हस्तक्षेप है। यह बिल हिंदू रीति-रिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध है।
करपात्री महाराज के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा और दूसरे हिंदूवादी संगठन हिंदू कोड बिल का विरोध कर रहे थे। इसलिए जब इस बिल को संसद में चर्चा के लिए लाया गया तब हिंदूवादी संगठनों ने इसके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन शुरू कर दिए। आरएसएस ने अकेले दिल्ली में दर्जनों विरोध-रैलियां आयोजित की।
कुछ संगठनों और लोगों के विरोध की वजह से हिंदू कोड बिल उस समय संसद में पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में अलग-अलग भागों में जैसे हिंदू विवाह कानून, हिंदू उत्तराधिकार कानून और हिंदू गुजारा एवं गोद लेने संबंधी कानून के रूप में अलग-अलग नामों से पारित हुआ जिसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए।
दरअसल, डॉ. आंबेडकर हिंदू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वे कहते थे, ‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिंदू कोड बिल पास कराने में है।’ लेकिन यह बिल उस समय पारित नहीं हो सका। डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल समेत अन्य मुद्दों को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
असल में डॉ. आंबेडकर का हिंदु कोड बिल का सपना सन् 2005 में साकार हुआ जब संयुक्त हिंदू परिवार में पुत्री को भी पुत्र के समान कानूनी रूप से बराबर का भागीदार माना गया। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पुत्री विवाहित है या अविवाहित। हर लडक़ी को लडक़े के ही समान सारे अधिकार प्राप्त हैं। संयुक्त परिवार की संपत्ति का विभाजन होने पर पुत्री को भी पुत्र के समान बराबर का हिस्सा मिलेगा चाहे वो कहीं भी हो। इस तरह महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में डॉ.आंबेडकर ने बहुत सराहनीय काम किया।
वयस्क मताधिकार भी डॉ. आंबेडकर का ही विचार था जिसके लिए उन्होंने 1928 में साइमन कमिशन से लेकर बाद तक लड़ाई लड़ी। इसका उस समय विरोध किया गया था। उस समय यूरोप में महिलाओं और अमेरिका में अश्वेतों को मताधिकार देने पर बहस चल रही थी। आंबेडकर ने वोट डालने के अधिकार के मुद्दे को आगे बढ़ाया। उन्होंने निर्वाचन सभा के सदस्यों को चेताया था कि भारतीय राज्यों को एक जगह लाने की उत्सुकता में वह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से समझौता न करें। डॉ. आंबेडकर ने संरक्षण आधारित लोकतंत्र के बजाय नए भारत के लिए अधिकारों वाले लोकतंत्र को चुना।
सच कहे तो उनका पूरा जीवन मानवता की सेवा में रत रहा। वे मानव मात्र की बेहतरी के पक्षधर थे। उनका पूरा जीवन दर्शन चार प्रसिद्ध शब्दों पर टीका था। स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व। यही शब्द भारतीय संविधान का आधार भी बने। वे बहुत बड़े लेखक भी रहे है। उनने जितनी भी किताबें लिखी उन सबका आधार सामाजिक समानता ही रहा है।
संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उनने संविधान में सभी नागरिकों के लिए सबसे पहले समानता का अधिकार ही सुनिश्चित किया। बावजूद इसके डॉ. आंबेडकर के समानता और जाति उन्मूलन संबंधी प्रश्न आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं। बल्कि असमानता और जातिवाद रूप बदल कर पहले से कहीं अधिक खतरनाक होकर सामने आए है।
संविधान सभा की अंतिम बहस को समाप्त करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम अंतर-विरोधों के जीवन में प्रवेश करेंगे, राजनीति में तो समानता होगी, परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। संविधान निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने के बावजूद संविधान के दुरुपयोग की स्थिति में वे खुद संविधान जलाने तक की बात कह जाते हैं।

बतौर डॉ. आंबेडकर जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके लिए बेमानी है। डॉ. आंबेडकर के कथनों में शोषितों, पीडि़तों और वंचितों के नागरिक अधिकारों व समतामूलक, लोकतांत्रिक भारत बनाने के प्रति जितनी बेचैनी थी उतनी ही भारतीय महिलाओं को समाज में सम्मान दिलाने की थी।
असल में वे भारतीय समाज में जातिवाद को लेकर भी काफी चिंतित थे। इसको लेकर उनका स्पष्ट मानना था कि गर भारत में यही सामाजिक संरचना बनी रही तो देश के मेनपावर का सदूपयोग नही हो पाएगा। वे जाति को विघटनकारी व विभाजनकारी मानते थे। लेकिन समाज का जो पिछड़ा तबका था उसे किसी भी हाल में समाज की मुख्यधारा में भी लाना चाहते थे।
आरक्षण उसी का एक रूप है। वे तमाम पिछड़ी जातियों के कल्याण के पक्षधर थे लेकिन देश के सभी राजनैतिक दलों ने शुरू से ही कुछ चुनिंदा जातियों को संरक्षण दिया और आगे बढ़ाया। जिसके कारण कुछ ही जातियों और उनके परिवारों का संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व हो पाया।

आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी पिछड़ी समाज के कई योग्य लोग संसद और विधान सभाओं में अपने प्रतिनिधित्व को तरस रहे हैं। राजनैतिक दलों द्वारा लगातार किए जा रहे इस जाति आधारित भेद भाव को समझना भी जरूरी है। आज भी सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के राजनेता, पिछड़ों व दलितों की जमीनी हकीकत से अंजान है।
ये सत्ता की लालसा में अंधे होने वाले दलित बहुजन ब्राह्मणवाद और मनुवाद को कोसते तो जरूर हैं, लेकिन इन्हीं के सहयोग और आशीर्वाद से सत्ता-सुख भोगने, मंत्री, मुख्यमंत्री बनने और सत्ता के लिए पिछड़ों व दलितों के अधिकारों से खिलवाड़ करते है। इसी कारण कई जातियां राजनीति के हाशिए पर चली गई हैं।
इस समय फिर आज एक डॉ. बाबा साहेब भीमराव राव अंबेडक़र की आवश्यकता महसूस की जा रही है जो जाति, धर्म और संप्रदाय की कुंठित और संकुचित मानसिकता से उपर उठ कर भारतीय जन मानस के सर्वागींण कल्याण के लिए काम कर सके।

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