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बीएमसी चुनाव के तुरंत बाद एक बार फिर शुक्ला कम्पाउंड के नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी ने छेड़ा संघर्ष !

Last updated: January 20, 2026 1:04 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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मुंबई। मुंबई शहर में ‘स्लम अ‍ॅक्ट’ का संरक्षण होने के बावजूद, निजी जमीन पर पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से बसे हुए शुक्ला कंपाउंड बस्ती में महानगरपालिका और विकासकों द्वारा मिलकर की जा रही अन्यायपूर्ण निष्कासन कार्रवाई के बारे में जिक्र करते हुए उत्तर मुम्बई के पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश श्री भूषण रामकृष्ण गवई को पत्र लिखा है।
पत्र में उन्होंने जिक्र किया है कि दहिसर (पूर्व) रावलपाडा में स्थित शुक्ला कंपाउंड बस्ती एक निजी जमीन पर बसी हुई, चार दशकों से अस्तित्व में रहने वाली बस्ती है। उस समय मूल जमीन मालिक की सहमति से चालें बनाई गई थीं। लेकिन कन्व्हेन्स डीड न होने और जमीन का औपचारिक हस्तांतरण न होने के कारण, प्रॉपर्टी कार्ड पर मूल मालिक का नाम ही बना रहा। कई दशकों बाद मूल मालिकों के बच्चे बड़े हुए तो उन्होंने यह जमीन अन्य व्यक्तियों को बेच दी। इसके बाद संबंधित विकासक ने महानगरपालिका के कुछ अधिकारियों को साथ लेकर, मुंबई महानगरपालिका अधिनियम की धारा 351 के तहत नोटिस देकर, तथाकथित ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ पूरा करने का दिखावा करके निष्कासन कार्रवाई का आदेश प्राप्त कर लिया। इसके विरोध में यहाँ के निवासी न्यायालय में गए। सभी नागरिक एक साथ नहीं बल्कि अलग-अलग तरीके से न्यायालय में जाने के कारण शायद न्यायालय की दृष्टि में यह उचित नहीं लगा होगा; हालांकि, आज तक किसी भी प्रकरण की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हुई है, और न ही कोई अंतिम आदेश या निष्कासन को मंजूरी देने वाली स्पष्ट अनुमति दी गई है।ऐसा होने के बावजूद, महानगरपालिका के अधिकारियों ने जल्दबाजी में तोड़फोड़ करके करीब सौ परिवारों में से लगभग 75 परिवारों के घर, साथ ही छोटे और मध्यम आकार के उदरनिर्वाह के लिए किए जा रहे छोटे व्यवसाय को जमींदोज कर दिया है। यह घटना न केवल अमानवीय है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को भी ठेस पहुँचाने वाली है।
जनसेवक शेट्टी ने आगे लिखा है कि मैं इस अन्याय के खिलाफ पहले दिन से ही लड़ रहा हूँ। विकासक से मैंने सीधे चर्चा भी की है। पालकमंत्री, संबंधित विभागों के मंत्री, और माननीय मुख्यमंत्री महोदय तक यह मामला मैंने लगातार रखा है। महानगरपालिका चुनावों के चलते कुछ समय संयम रखा था; लेकिन अब यह मामला फिर से पूरी ताकत से उठाऊँगा। इस वसाहत को स्लम एक्ट के तहत झोपड़पट्टी घोषित करने के लिए भी प्रयास चल रहे हैं और उस प्रक्रिया को गति मिल रही है। हालांकि, मेरा दृढ़ मत है कि, झोपड़पट्टी घोषित न होने पर भी 40 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में रहने वाली, नियमित रूप से महानगरपालिका को कर देने वाले घरों को सिर्फ एक विकासक के फायदे के लिए तोड़ना पूरी तरह से गलत, अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक है, ऐसा मुझे लगता है।
सरकारी विकास कार्यों-जैसे कि सड़कें, उद्यान, खेल के मैदान, अस्पताल आदि का निर्माण करते समय नागरिकों को वैकल्पिक जगह देकर न्याय दिया जाता है। लेकिन यहाँ कोई भी सार्वजनिक विकास कार्य न होने के बावजूद, सिर्फ निजी विकासक की मदद करने के उद्देश्य से यह निष्कासन कार्रवाई की गई है, यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस संदर्भ में आप मुझे थोड़ा समय दें, तो प्रत्यक्ष मिलकर आपका मार्गदर्शन लेने की मेरी नम्र इच्छा है। अंत में, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान जीवंत रखने का कर्तव्य आपका, मेरा और हम सभी का है। आपके आदेशों और मार्गदर्शन की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

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