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Reading: असाम्प्रदायिक धर्म के व्याख्याता आचार्य श्री तुलसी
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असाम्प्रदायिक धर्म के व्याख्याता आचार्य श्री तुलसी

Last updated: June 7, 2020 8:12 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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[24 वें महाप्रयाण दिवस पर विशेष ]

मुनि कमल कुमार।।
भारतदेश वीर और वीरांगनाओं की जन्मभूमि है। इस धरती पर अनेक वीरों ने जन्म लेकर देश का गौरव बढ़ाया है। उसी क्रम में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के नवमाधिशास्ता आचार्य श्री तुलसी का नाम भी बहुत सम्मान के साथ लिया जा सकता है। आचार्य श्री तुलसी का जन्म विक्रम संवत 1971 को राजस्थान के मारवाड़ सम्भाग में नागौर जिले के प्रसिद्ध शहर लाडनूं में पिता झूमर मलजी खटेड माता वदना जी की कुक्षी से कार्तिक शुक्ला द्वितीया को हुआ। आप अपने परिवार में सबसे छोटे थे। बचपन में ही आपके पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। घर की सारी जिम्मेदारी श्री मोहन लाल जी खटेड कुशलता पूर्वक वहन करते थे।
आपकी आदरणीया माता वदना जी एक धर्मनिष्ठ श्राविका थी। बचपन में ही माता से धार्मिक संस्कार प्राप्त हुए। आपके बड़े भाई चम्पालाल जी आप से एक वर्ष पूर्व ही पूज्य कालूगणी के कर कमलों से चुरू में दीक्षित हुए। आपका साधु साध्वियों से निरन्तर सम्पर्क था । प्रतिदिन साधु साध्वियों के दर्शन के बाद ही प्रातराश किया करते थे। पूज्य कालूगणी का लाडनूं में पावन पादार्पण आपके सौभाग्य का सूचक बना। पूज्य कालूगणी का मनमोहक व्यक्तित्व आपके मन मानस में छा गया। मन में दीक्षा के भाव जगे और भाई-बहन ( तुलसी और लाडां) की दीक्षा हो गई। दीक्षा के पश्चात् आपने अपना अमूल्य समय अध्ययन और साधना में लगा दिया। मात्र सौलह वर्ष की अवस्था में आप एक कुशल अध्यापक बन गये। गुरूकुल वास में सन्तों को अध्ययन कराते आपकी अप्रमत्त चर्या सभी के लिये प्रेरणा बनती गयी। आपके कंठ सुरीले थे, प्रवचन के समय जनता झूम उठती थी। आपकी अनेक विशेषताओं को देखकर अष्टमाचार्य कालूगणी ने मात्र 22 वर्ष की अवस्था में आपको अपना उतराधिकारी नियुक्त कर दिया।
आचार्य श्री तुलसी ने आचार्य बनने के बाद तेरापंथ समाज को नये-नये आयाम दिये, जिससे व्यक्ति-व्यक्ति का उद्धार हो। उन्होंने केवल जैन धर्म और तेरापंथ के लिए ही नहीं जन-जन के कल्याण का अभियान चलाया। उनके द्वारा चलाया गया अणुव्रत आंदोलन, प्रेक्षाध्यान जैन-अजैन सब के लिए ग्राहय हुआ। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डों राजेन्द्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी इसकी हृदय से प्रशंसा की और उन्होने इस आन्दोलन को गति प्रदान की। समाज के लिए नई मोड़ का आन्दोलन बहुत कारगर हुआ। बाल विवाह, मृत्यु भोज, घूंघट प्रथा, महिलाओं की शिक्षा ये मुख्य थे। आज जो महिलाओं का विकास नजर आ रहा है उसमें गुरुदेव श्री तुलसी का दूरदर्शी चिन्तन का सुश्रम बोल रहा है।
तेरापंथ समाज में ज्ञानशाला, किशोर मण्डल, कन्या मण्डल, युवक परिषद्, महिला मण्डल आदि के कारण हम नित नई प्रतिभाओं को देख रहे हैं । साहित्य निर्माण का कार्य संघ प्रभावना का मुख्य कारण हैं। आगम सम्पादन, अणुव्रत साहित्य, प्रेक्षाध्यान साहित्य, जीवन विज्ञान साहित्य, इतिहास-तत्व, कथा गीत आदि आदि अनेक विधाओं से लिखा गया साहित्य जन प्रिय बना।
आचार्य श्री तूलसी ने पंजाब से कन्याकुमारी तक की पैदल यात्रा करके इन्सान को इन्सान बनाने का महनीय कार्य किया। उनके अवदानों को प्रस्तुत करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा। पूर्ण स्वस्थ अवस्था में अपने आचार्य पद का विसर्जन कर अपने सक्षम उतराधिकारी युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य महाप्रज्ञ बनाकर श्लाघनीय कार्य किया। जो आज के इस पद लिप्सित युग के लिए बोधपाठ बन गया। आपको सरकार, धर्मसंघ, समाज और संस्थाओं से समय-समय पर सम्मानित किया गया । इन्दिरा गांधी राष्टीय एकता पुरूष्कार, भारत ज्योति, युगप्रधान, वाग्पति, गणाधिपति, हकीम खाँ, सूर खाँ आदि आदि।
गुरुदेव के 24 वें महाप्रयाण दिवस पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कामना करता हूँ कि आप द्वारा दर्शित पथ का अनुसरण करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी की अनुशासना में अपनी साधना कर अपने संयम जीवन को सफल बना सकूँ।

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