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Army Day : पाक राष्ट्रपति के बॉस रहे प्रथम भारतीय थल सेनाध्यक्ष को समर्पित है ये दिन

Last updated: January 15, 2019 12:12 pm
Surabhi Saloni
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9 Min Read
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गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को अब चंद दिन बचे हैं। इस दिन भारतीय सेनाओं और सशस्त्र बल राजपथ पर अपनी शौर्य, वीरता और ताकत का जोरदार प्रदर्शन करेंगीं। इससे पहले सेनाएं 15 जनवरी को मनाए जाने वाले सेना दिवस पर स्वतंत्र भारत के पहले चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ को याद करेगी। उनकी याद में ही 15 जनवरी को सेना दिवस के तौर पर मनाया जाता है। ये देश के दो फील्ड मार्शलों में से एक हैं और अब इन्हें भारत रत्न बनाने की कवायद शुरू कर दी गई है। वर्तमान थल सेनाध्यक्ष विपिन रावत ने कुछ दिनों पहले इन्हें भारत रत्न दिलाने का प्रयास करने की बात कही थी।
यहां हम बात कर रहे हैं, थल सेनाध्यक्ष जनरल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (KM Cariappa) की। उनके युद्ध कौशल और वीरता को देखते हुए भारत में नहीं विदेशों में भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। वह की देशों की सेना के गठन में भी अहम योगदान दे चुके हैं। इसी वजह से उन्हें सेवानिवृत्ति के 33 साल बाद फील्ड मार्शल की उपाधि से नवाजा गया था। भारत पाकिस्तान बंटवारे में भी उनकी बेहद अहम भूमिका थी।
28 जनवरी 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर जन्मे फील्ड मार्शल करिअप्पा ने महज 20 वर्ष की आयु में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी शुरू की थी। उनके पिता कोडंडेरा माडिकेरी में एक राजस्व अधिकारी थे। करिअपप्पा के अलावा उनके तीन भाई और दो बहनें थीं। करिअप्पा को उनके परिजन बचपन में प्यार से चिम्मा बुलाते थे। उन्होंने वर्ष 1937 में मुथू मचिया से शादी की। उनके एक बेटा और एक बेटी थी। करिअप्पा के बेटे सी करिअप्पा भी इंडिनयर एयरफोर्स में अधिकारी थे। उन्होंने अपने पिता की बायोग्राफी भी लिखी थी, जिसका नाम ‘फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा’ रखा था।
उन्होंने सेंकेंड लेफ्टीनेंट पद पर सेना में नौकरी की शुरूआत की थी। वह राजपूत रेजीमेंट में थे। करिअप्पा ने वर्ष 1947 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। 15 जनवरी 1949 में उन्हें भारत का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया था। इसी उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस के तौर पर मनाया जाता है। वर्ष 1953 में करिअप्पा सेना से रिटायर हो गए थे। हालांकि रिटायरमेंट के बाद भी वह किसी न किसी तरह सेना से जुड़े रहे।
प्री-कमीशन के लिए चुने गए पहले भारतीय थे
प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारतीय ने ब्रिटिश सरकार से सेना में स्थाई कमीशन देने की मांग की, जिसे मान लिया गया। इसके बाद कड़ी जांच और प्रशिक्षण के दम पर करिअप्पा को उस पहले दल में शामिल किया गया, जिसे कठोर प्री-कमीशन प्रशिक्षण दिया जाना ता। वर्ष 1919 में वह KCIO (King’s Commissioned Indian Officers) के पहले दल में सम्मिलित किय गया। इस दल को इंदौर के डैली कॉलेज में कड़ा प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद 1922 में उन्हें स्थाई कमीशन देकर सेकेंड लेफ्टिनेंट बनाया गया। उन्होंने इराक में भी सेवाएं दी। 1941-42 में वह इराक, सीरिया और ईरान में तैनात रहे। 1943-44 में वह म्यांमार में पोस्ट हुए।
ब्रिटिस सम्मान दिया गया
इससे ठीक पहले 1942 में किसी यूनिट का कमांड पाने वाले पह पहले भारतीय सैन्य अधिकारी बने थे। उन्होंने म्यामांर से जापानी सेना को निकालने में अहम योगदान दिया। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने उन्हें ‘ऑफिसर ऑफ दि ऑर्डर ऑफ दि ब्रिटिश एम्पायर’ सम्मान से नवाजा था। 1946 में वह ब्रिगेडियर बने। अगले साल उन्हें इम्पीरियल डिफेंस कॉलेज यूनाइटेड किंगडम में एक प्रशिक्षिण के लिए चुना गया। इस कोर्स के लिए चुने वाले भी वह अकेले भारतीय थे।
भारत-पाक सेना का बंटवारा
देश की आजादी के बाद करिअप्पा को मेजर जनरल रैंक के साथ डिप्टी चीफ ऑफ दि जनरल स्टॉफ बनाया गया। इसके बाद उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल बनाकर ईस्टर्म आर्मी का कमांडर बना दिया गया। 1947 में भारत-पाक युद्द के समय वह पश्चिमी कमान संभाल रहे थे। इसके बाद ही 15 जनवरी 1949 को उन्हें आजाद भारत का पहला चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ नियुक्त किया गया था। भारत-पाक आजादी के वक्त उन्होंने दोनों देशों की सेनाओं के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया था।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उच्चायुक्त भी रहे
करिअप्पा वर्ष 1953 में सेना से रिटायर हुए। इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में बतौर उच्चायुक्त भी सेवाएं दी। वर्ष 1956 तक वह उच्चायुक्त बने रहे। वरिष्ठ अनुभवी अधिकारी होने के नाते उन्होंने कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी सहायता दी। भारत सरकार ने सन 1986 में उन्हें ‘फील्ड मार्शल’ का पद दिया। सेवानिवृत्ति के बाद केएम करिअप्पा कर्नाटक के कोडागु जिले के मदिकेरी में बस गए। वह प्रकृति प्रेमी थे और लोगों को पर्यावरण संरक्षण आदि के बारे में भी अवगत कराया। 94 साल की उम्र में करिअप्पा का निधन 15 मई 1993 को बैंगलुरू में हुआ था।

भारत में अब तक दो ही फील्ड मार्शल हुए हैं
भारतीय सेना में फील्ड मार्शल का पद सर्वोच्च होता है। ये पंच-सितारा जनरल ऑफिसर रैंक है। ये पद सम्मान स्वरूप दिया जाता है। भारतीय इतिहास में अभी तक यह रैंक मात्र दो अधिकारियों को प्रदान किया गया है। देश के पहले फील्ड मार्शल, सैम मानेकशॉ हैं। उन्हें जनवरी 1973 में राष्ट्रपति ने फील्ड मार्शल पद से सम्मानित किया था। उन्हें सैन्य क्रॉस, पद्म विभूषण और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था। एम करिअप्पा देश के दूसरे फील्ड मार्शल थे। उन्हें 1986 में फील्ड मार्शल बनाया गया था। करिअप्पा को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, मेन्शंड इन डिस्पैचेस और लीजियन ऑफ मेरिट जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया था। इनके अलावा वर्ष 2002 में मार्शल ऑफ एयर फोर्स की रैंक से सम्मानित किए गए मार्शल अर्जुन सिंह वायुसेना से कभी भी सेवानिवृत्त नहीं हुए। 1965 के युद्ध में उन्होंने पाकिस्तान को बुरी तरह से धूल चटाई थी।

पाक राष्ट्रपति के रहे चुके ते BOSS
फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा बंटवारे से पहले पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के भी BOSS (बॉस) रह चुके थे। उन्हीं से जुड़ा करिअप्पा की जिंदगी का एक ऐसा प्रसंग है जिसने उन्हें सबसे महान सैनिक बना दिया था। बात वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध की है। करिअप्पा रिटायर होकर कर्नाटक के अपने गृहनगर में रह रहे थे। उनका बेटा केसी नंदा करिअप्पा उस वक्त भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट था। युद्ध के दौरान उसका विमान पाकिस्तान सीमा में प्रवेश कर गया, जिसे पाक सैनिकों ने गिरा दिया। नंदा ने विमान से कूदकर जान तो बचा ली, लेकिन वह पाक सैनिकों के हत्थे चढ़ गए।

उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान थे, जो कभी केएम करिअप्पा के अधीन भारतीय सेना में नौकरी कर चुके थे। उन्हें जैसे ही नंदा के पकड़े जाने का पता चला उन्होंने तत्काल केएम करिअप्पा को फोन किया और बताया कि वह उनके बेटे को रिहा कर रहे हैं। इस पर करिअप्पा ने बेटे का मोह त्याग कर कहा कि वह केवल मेरा बेटा नहीं, भारत मां का लाल है। उसे रिहा करना तो दूर कोई सुविधा भी मत देना। उसके साथ आम युद्धबंदियों जैसा बर्ताव किया जाए। आपसे (अयूब खान से) गुजारिश है कि सभी युद्धबंदियों को रिहा कर दीजिए या फिर किसी को नहीं। हालांकि युद्ध समाप्त होने पर पाकिस्तान ने सेना को रिहा कर दिया था।

 

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