फिल्म रिव्यूः सस्पेंस की दिलचस्प कहानी “जिंदगी शतरंज है”

हितेन तेजवानी और कविता त्रिपाठी अभिनीत फिल्म “जिंदगी शतरंज है” एक दिलचस्प सस्पेंस फिल्म है। फिल्म में एक्शन की कमी जरूर है, लेकिन इसमें थोड़ा अलग किस्म का सस्पेंस फिल्म का सबसे मजबूत पहलू है। आनंद मोशन पिक्चर के बैनर तले बनी फिल्म “जिंदगी शतरंज है” के निर्माता आनंद प्रकाश, मृणालिनी सिंह एवं फहीम कुरेशी हैं जबकि निर्देशक दुष्यंत प्रताप सिंह हैं। कहानी, स्क्रीन प्ले एवं डॉयलॉग एम. सलीम ने लिखा है। म्युजिक अज्जन भट्टाचार्य एवं इंद्रानी भट्टाचार्य का है जबकि लिरिक्स कुमार द्वारा लिखी गई है। कलाकारों में हितेन तेजवानी, कविता त्रिपाठी के अलावा पंकज बेरी, हेमंत पांडे, राजकुमार कनौजिया, सावर अली, जैद शेख एवं एकता जैन ने अभिनय किया है।

कहानीः कविता मल्होत्रा (कविता त्रिपाठी) अपने पति विशाल मल्होत्रा (जैद शेख) को विदेश जाने के लिए एयरपोर्ट छोड़कर देर से घर पहुंचती हैं, तभी उनका नौकर वासु (हेमंत पांडेय) बताता है कि साहब तो काफी पहले घर आ गए और ऊपर सो रहे हैं। कविता कहती है मैं तो उन्हें एयरपोर्ट छोड़कर आई घर कैसे आ गए, वह भागकर ऊपर बेडरूम में जाती है और सो रहे व्यक्ति को जगाती है तो देखती है कि बेडरूम में एक अजनबी (हितेन तेजवानी) सो रहा है। यह देखकर कहती है तुम कौन हो तो वह कहता है मैं विशाल हूं। इस पर कविता नौकर वासु को बुलाती है और कहती है यह तो कोई और है लेकिन वासु भी कहता है कि यह तो साहब ही हैं। कविता पुलिस को फोन लगाती है और पुलिस आती है तो वह अजनबी विशाल मल्होत्रा होने के तमाम सबूत पेश करता है और कहता है कि मैं ही विशाल मल्होत्रा हूं, मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह मुझे पहचान नहीं पा रही है। वासु भी उसकी हां में हां मिलाता है और पुलिस जांच करने की बात कहकर चली जाती है। इसके बाद क्या होता है, थिएटर जाकर फिल्म खुद देखेंगे तो अधिक मजा आएगा।

निर्देशन एवं अभिनयः “जिंदगी शतरंज है” का निर्देशन दुष्यंत प्रताप सिंह ने किया है, लेकिन वह एकदम सपाट रह गया है, फिल्म में काफी कुछ करके इसे और भी रोमांचक बनाया जा सकता था। हितेन तेजवानी, पंकज बेरी, हेमंत पांडे और राजकुमार कनौजिया जैसे मजे हुए कलाकारों का बेहतर उपयोग हो सकता था, लेकिन निर्देशक इसमें कामयाब होते नहीं दिख रहे हैं। अगर अभिनय की बात करें तो हितेन तेजवानी कविता त्रिपाठी एकदम सामान्य हैं, क्योंकि उन्हें करने के लिए कुछ खास नहीं था। बाकी कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिका को सामान्य तरीके से ही किया है। राजकुमार कनौजिया एवं एकता जैन ने थोड़ा सा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की है बावजूद इसके उनके लिए भी कुछ खास नहीं था।

म्युजिकः फिल्म में दो गाने हैं, जिनमें से पहला गाना “ गड़बड़-गड़बड़…” फिल्म की शुरुआत में फिल्माया गया है, जिसे दलेर मेहंदी ने गाया है। जबकि दूसरा गाना क्लब में फिल्माया गया आयटम सांग “बदनाम न कर देना” है। इनमें से एक भी गाना इतना प्रभावी नहीं हो पाया है कि बाद में याद रखा जा सके।

कुल मिलाकर फिल्म सस्पेंस और थ्रिलर के शौकीनों के लिए है। कहानी दिलचस्प है, इसलिए फिल्म बढ़िया बन सकती थी, लेकिन काफी कमी रह गई, जिसकी वजह फिल्म प्रभाव नहीं छोड़ती। हालांकि दूसरा पार्ट भी बनने का संदेश फिल्म में दिया गया है, सो अगले पार्ट में पिछली कमियों से सुधारकर बेहतर किया जा सकता है।

सुरभि सलोनी की तरफ से फिल्म को 2.5 स्टार।

  • दिनेश कुमार

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