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Reading: आत्मा शाश्वत, इसलिए आत्मकल्याण का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
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आत्मा शाश्वत, इसलिए आत्मकल्याण का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: August 16, 2025 6:06 pm
Surabhi Saloni
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6 Min Read
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Highlights
  • ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यामाला के श्रवण से भी लाभान्वित हुए श्रद्धालु
  • तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के 18वें राष्ट्रीय अधिवेशन में जुटे प्रोफेशनल्स
  • अच्छा विकास और अच्छा कार्य करते रहें प्रोफेशनल्स : युगप्रधान आचार्यश्री
  • मुख्यमुनिश्री ने अधिवेशन के संभागियों को किया उद्बोधित
  • टीपीएफ गौरव अलंकरण समारोह भी हुआ समायोजित

कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले, जन-जन को सन्मार्ग दिखाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में समय में प्रेक्षा विश्व भारती में चतुर्मास कर रहे हैं। आचार्यश्री की पावन सन्निधि में तेरापंथ समाज के विभिन्न समाजिक संगठनों के अधिवेशन, सम्मेलन, शिविर आदि का निरंतर क्रम लगा हुआ है। अभी जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन की सम्पन्नता हुई कि इसके साथ तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के त्रिदिवसीय 18वें राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारम्भ हो गया। इस संदर्भ में तेरापंथ समाज के देश भर से विभिन्न क्षेत्रों में महारत रखने वाले सैंकड़ों प्रोफेशनल्स आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे। अधिवेशन के दूसरे दिन ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में श्रद्धालुओं के साथ तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के अधिवेशन के संभागी प्रोफेशनल्स भी उपस्थित थे। युगप्रधान आचार्यश्री ने सर्वप्रथम ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन विद्या में शरीर के पांच प्रकार बताए गए हैं- औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस व कार्मण शरीर। अध्यात्म का मूल दर्शन यह है कि आत्मा और शरीर दोनों अलग-अलग हैं। दोनों मिलेजुले हो सकते हैं, किन्तु दोनों की सत्ता अलग-अलग होती है। पूरी दुनिया में दो ही तत्त्व होते हैं- जीव और अजीव। दो भी है, वह या तो जीव है अथवा अजीव है।
जितने भी प्राणी हैं, उन्हें देखा जाए तो जीव और अजीव का मिश्रित रूप है। उसका शरीर अजीव और उसमें व्याप्त चेतना जीव होती है। मोक्ष में गए जीव सिद्ध भगवान शुद्ध जीव होते हैं। पुद्गल, पदार्थ और धर्मास्तिकाय तथा अधर्मास्तिकाय शुद्ध अजीव हैं तथा मानव शरीर जीव और अजीव का मिश्रित रूप है। मानव जीवन जीव और अजीव का मिश्रित रूप है। प्रत्येक मनुष्य के साथ तीन शरीर होते ही होते हैं। औदारिक शरीर जो स्थूल शरीर दिखाई देता है। इसके साथ-साथ एक सूक्ष्म शरीर तैजस और सूक्ष्मतर कार्मण शरीर होता है। प्राणी के मृत्यु के बाद औदारिक छूट जाता है, लेकिन तैजस और कार्मण शरीर जीव के साथ ही जाते हैं। ये दोनों शरीर प्राणी के अगले जन्म में भी साथ रहते हैं। जब तक जीव सिद्धावस्था को नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक तैजस व कार्मण शरीर आत्मा के साथ रहते ही रहते हैं। कोई कोई प्राणी के साथ वैक्रिय और कोई-कोई साधु-संत के पास आहारक शरीर भी हो सकता है। देवताओं का स्थूल शरीर वैक्रिय होता है। नारकीय जीवों के भी वैक्रिय शरीर होता है। औदारिक शरीर की यह विशेषता है कि केवल ज्ञान केवल मनुष्य को ही होगा और मोक्ष की प्राप्ति भी केवल इसी शरीर को धारण करने वाले को प्राप्त होगा। प्रेक्षाध्यान पद्धति में एक है शरीर प्रेक्षा। वर्तमान में प्रेक्षाध्यान कल्याण वर्ष चल रहा है। शास्त्र में कहा गया है कि यह शरीर विनाशधर्मा, अनित्य, अशाश्वत है। यह शरीर नित्य नहीं है। आत्मा ही केवल शाश्वत होती है। आत्मा में संकुचन और विस्तार का गुण होता है। आत्मा छोटे से छोटे शरीर में भी समा जाती है और वही आत्मा हाथी के शरीर में भी प्रविष्ट हो जाती है। आत्मा में संकोच और विकोच करने का गुण होता है। इससे आदमी को यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि आदमी को जितना स्थान, आदि-आदि उपलब्ध हो जाए, उतने में ही अपने आपको स्थापित कर लेने का प्रयास करना चाहिए। जितना स्थान मिल जाए, उतने में समाहित होने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार शरीर नश्वरता और आत्मा की अमरता को जानकर अपनी आत्मा को विशुद्ध बनाने का प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान शृंखला को आगे बढ़ाया। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम का 18वां राष्ट्रीय अधिवेशन प्रारम्भ हुआ। आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में मंचीय उपक्रम था। इस संदर्भ में तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि रजनीशकुमारजी, राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री हिम्मत माण्डोत, मुख्य न्यासी श्री एस.के. सिंघी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुख्यमुनिश्री ने भी टीपीएफ अधिवेशन उपस्थित सदस्यों को संबोधित किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में पावन आशीष प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञान पर आवरण होता है तो आदमी अपने अच्छे-बुरे की पहचान भी नहीं कर पाता। कई लोगों में ज्ञान का बहुत अच्छा विकास होता है। बुद्धि की उपलब्धि बहुत विशेष बात होती है। पढ़ने वाले योग्यता के साथ डिग्री भी प्राप्त करते हैं, वह भी एक प्रकार की तपस्या है। वे सामान्य से ज्यादा मेहनत कर सारस्वत साधना कर डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर आदि-आदि बनता है। तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के अधिवेशन का यह क्रम है। ज्ञान में तर्क होना चाहिए और अनुशासन में सतर्क रहना चाहिए। ज्ञान में तर्कशीलता होनी चाहिए। तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम में कितने लोग जुड़े हुए हैं। यह बौद्धिक लोगों का एक संगठन है। यह समाज की एक शक्ति है। प्रोफेशनल लोग अपने कार्य के साथ धार्मिकता के क्षेत्र में भी अपना विकास करें और आगे भी अच्छा कार्य करते रहें। श्रीमती रितू चोरड़िया को टीपीएफ की ओर से टीपीएफ गौरव अलंकरण प्रदान किया गया। उनका परिचय टीपीएफ के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्री नरेश कठौतिया ने प्रस्तुत किया। श्रीमती चोरड़िया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस सम्मान कार्यक्रम का संचालन टीपीएफ के महामंत्री श्री मनीष कोठारी ने किया।

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