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Reading: आत्मा को जीतने वाले की होती है परम जय : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण
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आत्मा को जीतने वाले की होती है परम जय : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: April 22, 2026 7:53 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • शांतिदूत आचार्यश्री ने ‘युद्ध करें: विजय वरें’ विषय को किया वर्णित 
22.04.2026, बुधवार, लाडनूं। बुधवार को जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘शुद्ध करें: विजय वरें’ का वर्णन करते हुए कहा कि आगम में युद्ध की बात आई है। आगम में अपने से ही लड़ने की बात बताई गई है। दुनिया में युद्ध भी चलते हैं। दूसरों से भी लड़ने की बात होती है। युद्ध के मैदान में यदि कोई योद्धा दस लाख शत्रुओं को जीत लेता है, यह उसकी विजय तो होती है, लेकिन परम विजय नहीं होती। वहीं एक साधक आदमी केवल अपनी आत्मा को जीत लेता है, वह उस आदमी परम जय होती है।
प्रश्न हो सकता है कि आत्मा के साथ युद्ध कैसे करें? कषाया आत्मा के साथ युद्ध लड़ें, अशुभ योग आत्मा के साथ, मिथ्यादर्शन आत्मा के साथ लड़ें। अशुभ योग आत्मा से लड़ने के लिए शुभ योग आत्मा का प्रयोग करें। मिथ्यादर्शन आत्मा से लड़ने के लिए सम्यक् दर्शन का प्रयास हो। कषाय आत्मा को जीतने के लिए प्रतिपक्ष भावना का प्रयोग किया जा सकता है। गुस्से से लड़ना है तो क्षमा का प्रयोग हो। अहंकार से लड़ने के लिए मार्दव का प्रयोग करें। माया से लड़ना है तो आर्जव का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। लोभ से लड़ने के लिए संतोष को आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। पांचों इन्द्रियों को पर विजय प्राप्त कर लेने वाला आदमी अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर सकता है। यह युद्ध आत्मयुद्ध होता है, उसे धर्मयुद्ध भी कहा जाता है।
आदमी में गुस्से की प्रवृत्ति हो तो उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपनी साधना के द्वारा कषायों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। छल-कपट को दूर करने के लिए आदमी को मृदुता का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। लोभ मन में आए तो जहां तक संभव हो, संतोष को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों को देने से संतोष के भाव का विकास हो सकता है। जिसके भीतर उदारता की स्थिति आ जाती है, मानों उसकी लोभ की वृत्ति पर नियंत्रण हो जाता है। इस प्रकार आदमी को बड़ी शांति से, कषायों को आराम से जीतने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने इन्द्रियों का भी संयम करने का प्रयास करना चाहिए। कान का संयम करने का प्रयास हो। कानों से भगवद् वाणी, जीवन की, साधना की वाणी प्राप्त हो रही हो तो उसे ध्यान पूर्वक सुनने और उसे ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार शरीर के अन्य इन्द्रियों का भी संयम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को स्वाद, विवाद से बचने और संवाद करने का प्रयास करना चाहिए। आगम स्वाध्याय से भी आत्मयुद्ध में सहायता प्राप्त हो सकती है। सभी को अपनी आत्मा को जीतने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित कर उन्हें मानसिक शांति प्रदान की। मंगल प्रवचन से पूर्व आचार्यश्री ने ध्यान का भी प्रयोग कराया।

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