मुंबई। महाराष्ट्र सरकार और पुलिस उन लोगों को अनुमति नहीं देती है, जिनकी घर पर मृत्यु हो चुकी है या पारिवारिक सदस्य सीरियस हैं। उन्हें सलाह दी जाती है कि वीडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा अंतिम संस्कार का दर्शन लें। लेकिन गृह विभाग के प्रधान सचिव (विशेष) के तौर पर पदस्थ आईपीएस अधिकारी अमिताभ गुप्ता ने डीएचएफएल के प्रमोटर कपिल और धीरज वाधवान के परिवार के लिए इमरजेंसी पास जारी किया। जिसके आधार पर वाधवान फैमिली के 23 लोग बुधवार को 5 गाड़ियों में सवार होकर खंडाला से महाबलेश्वर स्थित अपने फार्महाउस पहुंच गए। उनके साथ गार्ड और रसोइए भी गए। इसे लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने आरोप लगाया है कि वाधवान जैसे वीआईपी को खुली छूट दे रहे हैं, जबकि आम लोगों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा अंतिम संस्कार का दर्शन लेने की सलाह दी जाती हैं, ऐसा क्यों? क्या देश में सबके लिए नियम अळग-अलग हैं?
अनिल गलगली ने कहा है कि आम लोगों को एक न्याय और वीआईपी के लिए अलग न्याय, यह सरासर गलत है और जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है उन्हें अनुमति दी जानी चाहिए। गृह विभाग के प्रधान सचिव अमिताभ गुप्ता ने पद का दुरुपयोग किया है और यह साबित कर दिया है कि सरकार और पुलिस प्रशासन किसके लिए काम कर रहे हैं। अनिल गलगली ने सरकार से मांग की हैं कि अमिताभ गुप्ता द्वारा पत्र जारी करने और बाद के 2 दिन का उनकी मोबाइल बातचीत की जाँच की जाए ताकि सच्चाई सामने आए। हालांकि मामला प्रकाश में आने के बाद आईपीएस गुप्ता को अनिवार्य छुट्टी पर भेज दिया गया है जबकि वाधवान परिवार को एक बिल्डिंग में क्वारैंटाइन किया गया है।
आम लोगों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अंतिम दर्शन लेने की सलाह और वीआईपी वाधवान को कैसे मिली छूट?

