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अहिंसा यात्रा के अंतर्गत आचार्यश्री का 25 किलोमीटर की पदयात्रा

Last updated: December 27, 2019 9:24 pm
Surabhi Saloni
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जिसने सब कुछ त्याग, वह तीन लोक का स्वामी : आचार्य महाश्रमण
आयोजित हुई शासनश्री मुनि सुखलालजी की स्मृति सभा
27-12-2019, शुक्रवार, गरानी, कर्नाटक। अहिंसा यात्रा प्रणेता तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने आज फिर 25 किलोमीटर की पदयात्रा की। आचार्यश्री प्रातः चल्लकेरे से लगभग 17.4 कि.मी. की पदयात्रा कर गरानी में पहुंचे। वहां स्थित मनवन्थरा नेशनल स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आदमी के भीतर अनासक्ति का संस्कार भी हो सकता है और आसक्ति का संस्कार भी हो सकता है। अनासक्ति व्यक्ति का स्वभाव और आसक्ति विभाव है। कभी-कभी विभाव इतना प्रगाढ हो जाता है कि वह स्वाभाव की तरह दिखने लग जाता है। जब आसक्ति के साथ भोग किया जाता है, कार्य किया जाता है, तब सघन कर्माें का बन्धन हो सकता है।
जहां आसक्तिपूर्वक भोग होता है, वहां कर्म प्रगाढ रूप में बंद सकते हैं। आदमी को पदार्थाें, खाद्य सामग्री के प्रति अनासक्ति रखनी चाहिए। पदार्थाें का उपयोग करना एक बात है और आसक्ति के साथ उपभोग करना दूसरी बात है। भोगी व्यक्ति संसार में भ्रमण करता है, अभोगी संसार से मुक्त हो सकता है। आदमी को योगी रहने का प्रयत्न करना चाहिए। मोक्ष के उपाय को योग कहा गया है। इस दृष्टि से स्वाध्याय, ध्यान आदि योग हैं। योग साधना का अभ्यास कर व्यक्ति योगी बन सकता है।
त्याग से बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है। जिसने भोगों का त्याग कर लिया, वह तो एक अपेक्षा से तीन लोक का स्वामी बन जाता है। जिसके पास पांच करोड़ की सम्पति है, वह करोड़पति हो सकता है, किन्तु वह पूरी दुनिया का मालिक नहीं हो सकता। साधु अकिंचन होता है, त्याग करता है, इसलिए वह मानों पूरी दुनिया का अधिपति होता है। आध्यात्मिक सम्पदा की दृष्टि से सबसे बड़ा वह धनवान होता है, जिसके पास क्षायिक सम्यकत्व और क्षायिक चारित्र होता है। आदमी को क्षायिक सम्यकत्व और क्षायिक चारित्र रत्न पाने का प्रयास करना चाहिए।
भीलवाड़ा प्रवासित शासनश्री मुनि सुखलालजी का गत 21 दिसम्बर को प्रयाण हो गया। कार्यक्रम में उनकी स्मृति सभा का उपक्रम रहा। उनके विषय में उद्गार व्यक्त करते हुए परमपूज्य आचार्यप्रवर ने कहा कि मुनिश्री सुखलाल जी स्वामी के प्रयाण से धर्मसंघ के कर्मठ और विद्द्वान मुनिवर का स्थान रिक्त हो गया। गुरुदेव तुलसी के द्वारा दीक्षित मुनिश्री सुखलाल जी स्वामी एक अच्छे वक्ता संत थे। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के शासनकाल में अपनी सेवा देने वाले मुनिश्री सुखलाल जी स्वामी एक अच्छे साहित्यकार सन्त थे। अनेक-अनेक कृतियां मानों मुनि सुखलालजी स्वामी का यशोगान गा रही है। ‘शासनश्री’ अलंकरण से विभूषित मुनिश्री सुखलालजी स्वामी धर्मसंघ के प्रति अच्छी निष्ठा रखने वाले मुनिवर थे। ‘अणुव्रत प्राध्यापक’ सम्मान से सम्मानित मुनिश्री सुखलालजी स्वामी ने अणुव्रत के क्षेत्र में जो कार्य किया और अणुव्रत के कार्यकर्ताओं को जो पोषण दिया वह अणुव्रत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। करीब पचहत्तर वर्षों का संयम पर्याय प्राप्त करने वाले मुनिश्री सुखलालजी स्वामी के प्रति में अपना मंगलभाव व्यक्त करता हूं।
मुनि सुखलालजी की स्मृति में आचार्यप्रवर और उपस्थित साधु-साध्वियों तथा श्रावक-श्राविकाओं ने चार लोगस्स का ध्यान किया। इस अवसर पर महाश्रमणी साध्वी प्रमुखाजी और मुख्य मुनिश्री ने मुनि सुखलालजी के व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर प्रकाश डाला। साध्वीवृंद और मुनिवृंद ने मुनि सुखलालजी की स्मृति में पृथक्-पृथक् गीतों का संगान किया। साध्वी जिनप्रभाजी, साध्वी कल्पलताजी, मुनि योगेशकुमारजी, मुनि कमलकुमारजी, मुनि कुमारश्रमणजी, मुनि अक्षयप्रकाशजी, मुनि कीर्तिकुमारजी, मुनि दीपकुमारजी, मुनि धर्मरुचिजी, मुनि मननकुमारजी, मुनि चैतन्यकुमारजी और मुनि रजनीशकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
मुनि सुखलालजी के संसारपक्षीय परिजनों की ओर से श्री ललित सेठिया और श्री चैनरूप पगारिया ने अपने हृदयोदगार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया। सायंकाल आचार्यश्री गरानी से प्रस्थान कर 7.5 किलोमीटर की पदयात्रा कर हिरैहल्ली में स्थित श्री चिन्तामनेश्वर हायर प्राइमरी स्कूल में पहुंचे। इस प्रकार आज की कुल पदयात्रा लगभग 25 किलोमीटर की हो गई।

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