वाशिंगटन:अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को सेना की छठी शाखा- स्पेस फोर्स बनाने के लिए कानून पर हस्ताक्षर कर दिया। इसके तहत अब अमेरिका के पास 16 हजार सैनिकों की ताकत वाली अलग सैन्य बल होगा, जो सिर्फ अंतरिक्ष में पैदा होने वाले खतरों से निपटेगा। ट्रम्प ने बिल पर हस्ताक्षर करते हुए कहा कि अब अंतरिक्ष में काफी कुछ होने वाला है, क्योंकि वह अब दुनिया का सबसे नया युद्धक्षेत्र बनने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्र की सुरक्षा में बढ़ते खतरे के बीच अंतरिक्ष में हमारी श्रेष्ठता बेहद जरूरी है। हम काफी आगे हैं, लेकिन रूस और चीन के खतरे से निपटने के लिए हमें हर क्षेत्र का नियंत्रण हासिल करना होगा।
अंतरिक्ष में रूस और चीन कैसे बने खतरा?
इसी साल अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीईए) ने रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया कि चीन और रूस ने अंतरिक्ष में खुफिया, जासूसी और सैन्य परीक्षण करने लायक सक्षम तकनीक विकसित कर ली है। दोनों ही देश साइबरस्पेस क्षमताएं विकसित करने में सफल हुए हैं। उनके पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के अलावा हवा में लेजर से हमला करने की भी क्षमता है। रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका के पास इस वक्त सैकड़ों सैन्य सैटेलाइट हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि रूस-चीन के अलावा ईरान और उत्तर कोरिया भी धीरे-धीरे अंतरिक्ष में अपनी पहुंच बना रहे हैं। इसके चलते अंतरिक्ष में चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका को इनसे निपटने के लिए अपनी ताकत में इजाफा करना होगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस कह चुके हैं कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में बीते एक दशक में काफी बदलाव हुए हैं। इसलिए यहां किसी नए विकास को अलग से नहीं देखा जा सकता।
अंतरिक्ष में अमेरिका की सबसे ज्यादा सैटेलाइट, इसलिए उनकी सुरक्षा अहम
अमेरिका के पास इस वक्त अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा सैटेलाइट हैं। इनमें से ज्यादातर सैटेलाइट उसने संचार व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए ही लगाई हैं। इसके अलावा जीपीएस और सैन्य कार्यों के लिए भी अमेरिका के पास सबसे ज्यादा सैटेलाइट हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प काफी समय से चिंता जताते रहे हैं। चीनी मिलिट्री सैटेलाइटों की बढ़ती संख्या और सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस के दोबारा मिलिट्री सैटेलाइट प्रोग्राम शुरू करने को भी अमेरिका स्पेस में चुनौती के तौर पर देख रहा है।
चीन ने 11 साल पहले टेस्ट किया था एंटी सैटेलाइट मिसाइल
अमेरिका के ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने पिछले कुछ सालों में अपने ऑर्बिट में ऐसे कई टेस्ट किए हैं। सबसे पहले 2007 चीन ने केटी-1 रॉकेट लॉन्च किया था। इस रॉकेट ने चीन के मौसम उपग्रह फेंग युन 1-सी को धरती से 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट में मार गिराया। इस टेस्ट के बाद 2500 से 3000 टुकड़े बिखर गए। बताया जाता है कि 2013 में चीन ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल डीएन-2 का परीक्षण कर लिया। इस टेस्ट के बाद अंतरिक्ष में तैर रहे चीनी उपग्रह के कुछ टुकड़े रूसी सैटेलाइट से टकरा गए थे। अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेंस को शक है कि चीन ने अपनी मिलिट्री में एंटी सैटेलाइट मिसाइलों के लिए विशेष यूनिट बना ली है। उसने काउंटर स्पेस क्षमताओं को विकसित करने के लिए ट्रेनिंग भी शुरू की है।
रूस पर लग चुका है अमेरिका-फ्रांस की सैटेलाइटों की जासूसी का आरोप
पिछले साल सिंतबर में फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने खुलासा किया था कि रूस की एक जासूसी सैटेलाइट लुक-ओलिम्प ने 2017 में फ्रेंच सैटेलाइट के सिग्नल तोड़ने की कोशिश की थी। फ्लोरेंस ने बताया था कि फ्रांस-इटली के साथ इसी सैटेलाइट के जरिए खुफिया सूचनाएं साझा करता है। रूस की सैटेलाइट की वजह से उन्हें अपनी सैटेलाइट को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना पड़ा। फ्रांस ने आरोप लगाया था कि रूस लुक सैटेलाइट के जरिए दूसरे देशों की सैटेलाइट के सिग्नल कैच करने की कोशिश में था।
इससे पहले अमेरिका ने 2015 में दावा किया था कि रूस की लुक सैटेलाइट ने करीब 11 बार उसकी दो इंटेलसैट सैटेलाइट के करीब आने की कोशिश की थी। एयरफोर्स अधिकारियों का कहना था कि इंटेलसैट सैटेलाइट सैन्य और ड्रोन मिशन के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में अधिकारी रूसी सैटेलाइट पर नजर रख रहे हैं। हालांकि, रूस का कहना था कि लुक सैटेलाइट गलती से अमेरिका की सैटेलाइट के बीच पहुंच गया। उसमें कम्युनिकेशन की दिक्कतें पैदा हो गईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने अंतरिक्ष में सैटेलाइट मार गिराने की क्षमता 1970 के दशक में ही हासिल कर ली थी।
भारत के पास भी अंतरिक्ष में सैटेलाइट मार गिराने की क्षमता
भारत ने इसी साल मार्च में एंटी सैटैलाइट मिसाइल ए-सैट के जरिए सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता हासिल कर ली थी। इसे ‘मिशन शक्ति’ नाम दिया गया था। इसमें भारत ने पृथ्वी से करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित सैटेलाइट को मार गिराया था। युद्ध की स्थिति में भारत इस तकनीक के जरिए दुश्मन देश की संचार और रक्षा व्यवस्था ध्वस्त कर ब्लैक आउट जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
फ्रांस कर चुका है स्पेस डिफेंस कमांड बनाने का ऐलान
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने इसी साल जुलाई में स्पेस डिफेंस कमांड शुरू करने की घोषणा की थी। मैक्रों का कहना था कि इससे हम अपनी सैटेलाइटों की बेहतर सुरक्षा कर पाएंगे। साथ ही अंतरिक्ष में अपनी स्थिति को भी मजबूत करेंगे। मैक्रों ने कहा था कि सितंबर 2020 तक फ्रांस एक बड़ी स्पेस कमांड तैयार कर लेगा। इसके बाद एयरफोर्स का नाम बदलकर एयर-स्पेस फोर्स किया जाएगा।

