औरंगाबाद। भगवान महावीर के जन्म से मात्र 250 वर्ष पूर्व इस धरती पर अवतरित होने वाले भगवान पार्श्वनाथ हमारे लिए आज भी प्रकाश स्तंभ के रूप में हैं। उनका नाम आने वाली सहस्त्राब्दियों तक उजाला बांटता रहेगा। काशी के महाराज अश्वसेन और उनकी रानी वामा के प्रांगण में उस दिन खुशियों का मेला लग गया, जब वे इस धरती पर अवतरित हुए ।पार्श्वनाथ की स्तुति एवं नाम स्मरण आज भी अत्यंत प्रभावी हैं । इस संदर्भ में “उवसग्गहर स्रोत “को एक निदर्शन के रूप में लिया जा सकता है। आचार्य श्री महाश्रमण जी विदुषी शिष्या साध्वी श्री निर्वाणश्री जी ने श्रद्धालुओं की विशेष उपस्थिति में उद्गार व्यक्त किए।
प्रबुद्ध साध्वी श्री योगक्षेमप्रभा जी ने कहा –जैन शासन में प्राप्त स्रोत एवं स्तुतियों में अब तक भगवान पार्श्वनाथ के संदर्भ में लिखी गई स्तुतियां सर्वाधिक हैं। वे अपने समय में लौह पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित थे।भगवान पार्श्व मैत्री के महासमंदर थें। मरुभूति के भव से लेकर भगवान पार्श्व बनने तक उनके अंतःकरण में मैत्री की धारा अस्खलित रूप से बहती रही। हम भी अपने जीवन में मैत्री का प्रयोग करते रहें।
साध्वी लावण्यप्रभा जी, साध्वी कुंदन यशाजी ,साध्वी मुदितप्रभा जी, साध्वी मधुरप्रभा जी एवं साध्वी श्रेयस प्रभा जी ने समवेत रूप में मधुर संगान किया ।साध्वी वृंद द्वारा पार्श्वस्तुति से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। ओम ह्रीं श्रीं पार्श्वनाथाय नमः के लयबद्ध जप ने वातावरण को विशेष रूप से मंगलमय बना दिया। अनेक भाई–बहनोंने उपवास , आयंबिल, एकासन आदि की आराधना कर भगवान पार्श्व के चरणों में श्रद्धापर्ण किया। तेरापंथी श्रद्धालुओं के अतिरिक्त स्थानकवासी ,मंदिर मार्गी श्रद्धालुओं की भी उत्साह पूर्वक सहभागिता रही। यह जानकारी संजय सेठिया (मंत्री- तें.सभा) औरंगाबाद ने दी।
पार्श्वनाथ जयंती पर विशेष कार्यक्रम: भगवान पार्श्व जिनका नाम सहस्त्राब्दियों तक उजाला बांटता रहेगा

