नालासोपारा। नालासोपारा ईस्ट के दामोदर हॉल में चतुरमासार्थ विराजित साध्वीवृन्द डॉ. धर्मशिला जी महाराज की सुशिष्या पूज्य डॉ. चारित्रशिला जी महाराज, डॉ. भक्तिशिला जी महाराज एवं मैत्रीशिला जी महाराज के सानिध्य में डॉ धर्मशिला जी महाराज की जन्म जयंती मनाई गई। साध्वीवृन्द ने गुरुणी डॉ धर्मशिला जी महाराज के जीवन के बारे में विस्तार से बताया और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर बढ़ने की बात कही।
इस मौके पर श्रावक-श्राविकाओं से खचाखच भरे हॉल में लोगों को संबोधित करते हुए डॉ चारित्रशिला जी महाराज अपने व्याख्यान में धर्मशिला जी महाराज के साथ अपने अनुभवों को बताते हुए कहा कि उनके गुण ऐसे थे एक-एक गुण को माला में पिरौएं तो उनकी गिनती मुश्किल होगी। वे गरीबों को देखकर उन्हें सुखी बनाने के लिए व्याकुल हो जाती थीं। उनकी योग्यता के गुरुदेव भी सम्मान करते थे। गुरुणी के देवलोक गमन के समय धर्मशिला की महाराज व हम सभी बहुत दुखी थे, गुरु का वियोग किसी संत को नहीं होना चाहिए। धर्मशिला जी महाराज ने पीएचडी करने की इच्छा त्याग दिया था लेकिन गुरुदेव के कहने पर उन्होंने फिर से किया। आपने मुम्बई में 19 चातुर्मास किये, जिनमें अधिकतर गुजराती स्थानकों में हुए। धर्मशिला जी महाराज ने हड़ताल कर रहे अस्पताल के कामगारों को निर्व्यसनी बनाया। दत्ता सामंत और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे यूनियन लीडर्स को आपने समझाया और अस्पताल में चल रहे हड़ताल को खत्म करवाया। आप पाठशालाएं बनवाते थे, शिविर लेते थे जिसके चलते तमाम आदर्श श्रावक-श्राविकाएं बनीं। तमाम किताबें लिखीं और भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय थीं। चरित्रशिलाजी महाराज ने भरे हुए गले से बताया कि आपका अंतिम चातुर्मास खार में हुआ। विहार करके अंधेरी पहुंची जहां 14 फरवरी को अस्पताल ले जाया गया और 16 फरवरी को उनका देवलोकगमन हुआ।
भक्तिशिला जी महाराज उनके जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि धर्मशिला जी महाराज कस्तूरी माता के कोख से जन्म लिया। पिता का नाम रामचन्द्र जी था तथा उनका बचपन का नाम विमला था, जो आगे चलकर दीक्षा लेकर धर्मशिला महाराज बनीं। आपने बताया कि 7 साल तक विमला अनाज नहीं खाती थीं। 18 साल तक वैराग्य में रहने के बाद दीक्षा ग्रहण किया। उज्वल कुमारी जी महाराज के मार्गदर्शन में धर्मशिला जी महाराज ने 9 विषयों पर पीएचडी किया और गोल्ड मैडल हासिल किया था।
आपने आगे फरमाया कि उनका जीवन ऐसा था कि लोग आज भी उन्हें याद करते हैं। विधवा महिलाओं को तिलक लगाती थीं, कुरीतियों को बंद कराया। सभी बहनों को सम्मान से जीने की पक्षधर थीं। समाज से व्यसन भी बंद कराया। उनकी रुची ही थी बच्चों को संस्कारी बनाना व व्यसन बंद कराना। आप संस्कृति, पाली, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू सहित 9 भाषाओं की ज्ञाता थीं। सीमित शब्दों में अपनी बातें रखती थीं। हम सभी को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और हमेशा धर्म मार्ग पर चलना चाहिए।
मैत्री शिला जी महाराज अंतगडादशा सूत्र का वाचन करते हुए उसे आगे बढ़ाते हुए बताया कि किस तरह इंसान को महापुरुषों के जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए और किसी के प्रति वैरभाव नहीं रखनी चाहिए। श्री कृष्ण के जीवन की घटनाओं को वर्णन करते हुए सूत्र को आगे बढ़ाया और एक हत्यारे और कृष्ण महाराज के बीच घटित घटनाओं का सुंदर वर्णन किया।
आज यहां श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ मेवाड़, मुम्बई के अध्यक्ष किशनलाल परमार, महामंत्री रोशनलाल बडाला, कोषाध्यक्ष नेमीचंद धाकड़, प्रकाशजी बादामा, प्रचार मंत्री पारस जी तातेड़ विशेष रूप से पहुंचे।
इस मौके पर लोगों को संबोधित करते हुए महामंत्री रोशनलालजी बडाला ने कहा कि मेवाड़ संघ मुंबई टीम अपने आपको सौभाग्यशाली मानता है कि हम अपने लक्ष्य के अनुसार धर्मशिला जी महाराज के जन्मदिन पर चातुर्मास के तीसरे दिन यहां आए। धर्मशिला जी महाराज का जीवन सदा अनुकरणीय रहेगा। उन्होंने बताया कि गुरुणी धर्मशिलाजी महाराज ने गुजराती एवं मारवाड़ी श्रावक-श्राविकाओं के बीच एक सेतु का काम किया। श्री बडाला ने धर्मशिला जी महाराज के जीवन की कई बातों को सभी के समक्ष रखा और मेवाड़ संघ की योजनाओं पर भी प्रकाश डाला तथा डायलिसिस सेंटर खोलने के लिए सहयोग की अपील की।
इस मौके पर अध्यक्ष रमेशचंद्र इंटोदिया, प्रमुख प्रमुख रमेशचंद्र बोहरा, नवयुवक मंडल के निवर्तमान अध्यक्ष प्रवीण इंटोदिया, उपाध्यक्ष नरेंद्र लोढा, महिला मंडल अध्यक्षा लक्ष्मीबेन इंटोदिया, मुकेश सांखला, लक्ष्मीलाल इंटोदिया, महावीर सिंघवी, कुंदन इंटोदिया, हिम्मत इंटोदिया सहित मेवाड़ संघ नालासोपारा, नवयुवक मंडल, महिला मंडल एवं कन्या मंडल के सदस्य, पदाधिकारियों व श्रावक-श्राविकाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही।
नालासोपारा में डॉ. धर्मशिला जी महाराज की जन्म जयंती मनाई गई, मुंबई संघ के पदाधिकारी भी पहुंचे

