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भारतीय संस्कृति के पुरोधा संत – आचार्य श्री तुलसी

Last updated: June 20, 2019 12:21 am
Surabhi Saloni
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6 Min Read
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• मुनि जिनेशकुमार
भारतीय संस्कृति के पुरोधा संत आचार्य श्री तुलसी का नाम बड़े गौरव के साथ लिया जाता है। उनका जीवन श्रम, साहस, संघर्ष, स्पंदन एवं सोच पांच सकारों का समवाय था । थे एक महान यायावर,सृजनशील, साहित्यकार, दार्शनिक, युगदृष्टा, युगपुरुष थे। वे अपना परिचय देते हुए कहते थे कि -“पहले में मानव हूँ, फिर हिन्दू हूँ, फिर जैन हूँ, फिर संत हूँ, फिर तेरापंथ का आचार्य हूँ, इन उदारतावादी विचारो के कारण वे जन-जन के मानस में अंकित हो गए। तभी तो गुजरात के प्रखर चिंतक एवं विद्वान साहित्यकार दलमुख भाई मालवनिया ने कहा – आचार्य श्री तुलसी का मतलब है-जैन धर्म और जैन धर्म का मतलब है – आचार्य श्री तुलसी। उन्होंने जैन धर्म को आधुनिक रूप देकर”जैन धर्म” को “जन धर्म” में विकसित किया । डॉ. राधाकृष्णन ने 14 महापुरुषों की जीवनी में आचार्य श्री तुलसी को एक महापुरुष के रूप में उद्धृत किया।
आचार्य श्री तुलसी सचमुच श्लाका पुरुष थे। उन्होंने समाज में शिक्षा, रूढ़ि उन्मूलन, कला, संस्कृति आदि नये आयाम देकर संघ को चहुंमुखी बनाया। ‘चिन्ता नहीं चिन्तन करो, व्यथा नहीं व्यवस्था करो, प्रशंसा नहीं प्रस्तुति करो’ उनके द्वारा प्रदत्त यह त्रिपदी समाज के विकास में योगभूत बनी। आचार्य श्री तुलसी एक साहित्यकार संत थे। उन्होंने अपनी अनवरत लेखनी से हिन्दी, संस्कृत, राजस्थानी आदि भाषाओं में 150 से ऊपर ग्रंथों की रचना की, जिनमें कालू-यशोविलास (राजस्थानी भाषा की उकृष्टतम कृति) मनोनुशासन, जैन सिद्धान्त दीपिका, सोमरस, अणुव्रत गीत आदि महत्वपूर्ण कृतियाँ है।
आचार्य श्री तुलसी एक अध्यात्म योगी थे। उन्होने अणुव्रत आंदोलन के जरिये राष्ट्रीय उत्थान,नैतिक जागरण, शान्ति, प्रेम, अहिंसा, सौहार्द और भाईचारा का जो संदेश दिया, वह हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। एक सम्प्रदाय के आचार्य होते हुए भी उन्होंने कहा -“आप जैन बने या न बनें किन्तु कम से कम गुडमैन अवश्य बने।” अलौकिक चेतना के धनी इस युगपुरुष का जन्म 20 अक्टूम्बर 1914 को लाडनूँ में हुआ। पिता का नाम झुमरमलजी तथा माता का नाम वदनाजी था। 5 दिसम्बर 1925 लाडनूँ में अप्टमाचार्य कालूगणी के कर कमलों से मुनि दीक्षा अंगीकार की। संस्कृत, प्राकृत, आगम, जैन दर्शन आदि विषयों का गहनतम अध्ययन किया। उन्होंने करीबन 20 हजार लोक कंठस्थ किए, वे 27 अगस्ट 1936 को गंगापुर में आचार्य पद पर पदासीन हुए।
मानवजाति के उत्थान के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक पाँच-पाँव चलकर उस विभूति ने अणुव्रत आंदोलन के द्वारा धर्म समन्वय धर्म क्रांति का संदेश दिया। जिसने उन्हें इतिहास पुरुष बना दिया। उनके व्यक्तित्व से केवल जैन समाज ही नहीं देश के मूर्धन्य चिन्तनशील, राजनेता आदि भी अछूते नहीं रहें। उन्होंने प्रेक्षाध्यान, जीवन-विज्ञान, अणुव्रत, महिला जागरण, समाज सुधार, समण श्रेणी का उदभव आदि अनेक आयाम संघ को दिये। 1961 में आचार्य काल के 25 वर्ष की सम्पन्नता पर, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राधाकृष्णन् ने गंगाशहर में अभिनंदन ग्रंथ भेंट कर सम्मानित किया। 1971 बीदासर में चतुर्विध धर्मसंघ द्वारा युगप्रधान की उपाधि से उन्हें अलंकृत किया गया। 1974 में उनके 60 वें जन्मदिवस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने दिल्ली में षष्टि पूर्तिग्रंथ भेंट कर सम्मानित किया।
आचार्य काल के 50 वर्ष की सम्पन्नता पर 1986 में उदयपुर में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारत ज्योति के अलंकरण से विभूषित किया गया। सारनाथ से तिब्बती उच्चशिक्षा संस्थान द्वारा 18 जून 1993 को वाक्पति तथा हाकिम खां सूरि सम्मान से विभूपित किया गया। 1993 में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। गुरुदेव तुलसी के सान्निध्य में राजसमन्द में अहिंसा प्रशिक्षण पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित हुआ । तथा राजसमन्द घोषणापत्र को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता प्राप्त दस्तावेज के रूप में स्वीकृत किया गया। आपके द्वारा 18 फरवरी 1994 को सुजानगढ़ में आचार्य पद का विसर्जन करने पर चतुर्विध धर्मसंघ द्वारा आपको गणाधिपति के शीर्षपद पर प्रतिष्ठित किया गया। सन् 1969 में अन्नामलाई (दक्षिण) विश्वविद्यालय में हिन्दी विरोधी छात्रों के मध्य हिन्दी में प्रवचन कर केवल राज भाषा हिन्दी की ही महत्ता नहीं बढ़ाई अपितु हिन्दी विरोधी अग्नि का भी उपशमन किया । संसद में आये गतिरोध को दूर कराने में उनकी विशेष भूमिका रही। हरीजन की झोपड़ी से लेकर राजभवन तक के लोगों से गहरा सम्बन्ध रहा। उनके द्वारा चलाये गये अणुव्रत कार्यक्रम को तात्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद एवं पंडित जवाहरलाल नेहरू, जय प्रकाशनारायण, विनोबा भावे, जैनेन्द्र कुमार,
यशपाल जैन, रामधारीसिंह दिनकर, आचार्य कृपलानी, गुरु गोलवलकरजी आदि अनेक प्रतिभा संपन्न,चिन्तनशील विचारकों का अपूर्व समर्थन एवं सहयोग रहा। ऐसे बहुआयामी व्यक्ति के धनी, ऐसे कर्मशील महापुरुष, राष्ट्र संत श्री तुलसी जो अंत तक साधना के प्रति जागरुक रहे। आषाढ़, कृष्णा तृतीया वि.सं. 2054 (23 जून 1997) को राजस्थान के
बीकानेर के उपनगर गंगाशहर में महाप्रयाण हो गया। भले वे आज सदेह हमारे सामने नहीं है परंतु उनके अमर संदेश आज भी मानवता को महका रहे हैं। और समूची मानव जाति का पथदर्शन कर रहे हैं।
ऐसे दिव्य पुरुष के पावन चरणों में शत-शत नमन।

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