बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में चातुर्मास प्रारम्भ से ही सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप के प्रांगण में आचार्य श्री पार्श्वचन्द्रजी म.सा. के सान्निध्य में तपस्याओं की झडियाँ लग गई है| कुल 6 गतिशील मासखमण में आज 3 तपस्यार्थी के 30 उपवास कि पूर्णाहुति हई| इस अवसर पर डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने कहा कि जैन धर्म में तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने का माध्यम नहीं, अपितु आत्मशक्ति के जागरण, कर्म-निर्जरा और आत्मशुद्धि की साधना है। जीव आठ प्रकार के कर्मों से बंधा है, और इन्हीं कर्मों के कारण संसार में सुख-दुःख का अनुभव करता है। तप की अग्नि कर्मों को क्षीण करने में सहायक बनती है। निर्जरा (तप) के १२ भेदों को सरल शैली में समझाते हुए कहा कि अनशन, ऊनोदरी, भिक्षाचर्या, रसपरित्याग, कायाक्लेश और प्रतिसंलीनता जैसे बाह्य तप के माध्यम से शरीर, इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ता है। जब बाह्य तप के साथ प्रायश्चित, विनय, वैयावच्च, स्वाध्याय और ध्यान जैसे आभ्यंतर तप जुड़ते हैं, तब साधक देह की आसक्ति से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से व्यक्ति ‘मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और मुझे कहां जाना है’ जैसे आत्मचिंतन के प्रश्नों की ओर बढ़ता है और ध्यान में चित्त की एकाग्रता के माध्यम से जब आत्मा में लीनता आती है तब जीव भेद विज्ञान की स्थिति में पहुँच जाता है| तप का अंतिम लक्ष्य किसी लौकिक उपलब्धि की प्राप्ति नहीं, अपितु कर्मबंधन से मुक्ति और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ना है।
मुनि श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में सच्चे सुख का आधार बाहरी अनुकूलता नहीं, बल्कि सहनशीलता, तितिक्षा और समभाव है। व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने का अभ्यास करता है तो कठिन समय में भी मानसिक संतुलन बनाए रख सकता है। उन्होंने आतापना, आयंबिल,उपवास जैसी तप आराधनाओं के माध्यम से सहनशक्ति विकसित करने की प्रेरणा दी। मजबूरी में सहा गया कष्ट और संकल्पपूर्वक किया गया तप अलग होता है; तप आत्मबल और समभाव को मजबूत करता है। मुनिश्री ने अन्न के सम्मान की प्रेरणा देते हुए कहा कि आवश्यकता से अधिक भोजन लेकर जूठन छोड़ना अन्न का अनादर है। मृगापुत्र के प्रसंग से उन्होंने समझाया कि सांसारिक सुख स्थायी तृप्ति नहीं देते और संयम के मार्ग को कठिन बताने वाली बातों से दृढ़ संकल्प वाला व्यक्ति विचलित नहीं होता।
उन्होंने कहा कि संसार में आजीविका चलाना भी अनेक कठिनाइयों से भरा है, जिन्हें व्यक्ति सांसारिक लाभ के लिए सहन कर लेता है, तो आत्मकल्याण के लिए संयम और तप से पीछे नहीं हटना चाहिए। धर्मकार्य को कल पर टालने के बजाय आज और अभी करने, क्रोध का तत्काल त्याग करने तथा गलती होने पर तुरंत क्षमा मांगने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि परिस्थितियों को बदलने से अधिक जरूरी अपनी मन:स्थिति को बदलना है|
सुरजीबाई छाजेड़, संदीप छाजेड़ और अमिता नाहटा के सुदीर्घ 30 उपवास की मासखमण तपस्या की पूर्णाहूति पर तपस्या की बोली द्वारा बहुमान किया गया। चातुर्मास समिती ने तीनों मासखमण तपस्वियों को प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, आचार्य सम्राट जयमलजी म.सा. का भावचित्र, माला, साफा, चूंदड़ी भेंट किए। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी,कार्याध्यक्ष सुनील गादिया,उपाध्यक्ष ज्ञानचन्द खींचा, विजयराज लोढ़ा,अभयकुमार बांठिया,प्रेमचन्द खींचा ने तपस्वी भाई-बहनों का सम्मान किया। श्री अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जयमल जैन श्रावक संघ, बेंगलुरु शाखा की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुणकुमार गोटावत, प्रांतीय अध्यक्ष मीठालाल लोढ़ा, प्रांतीय मंत्री मनोहरलाल डुगरवाल, रेवन्तमल नाहर, महेन्द्रकुमार मेहता,मीठालाल मकाणा,गौतमचन्द मकाणा,भवरलाल चोरड़िया ने तपस्वियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किए। जे.पी.पी. जैन महिला फाउण्डेशन ने तप की अनुमोदनार्थ एक गीतिका प्रस्तुत की। संगीता धोका, शांता धोका ने भी अपने भाव प्रगट किए। अक्षय श्रीश्रीमाल ने 30 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। चेन्नई से पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष पारसमल गादिया एवं जय जाप समिति के चेयर मेन श्री शांतिलालजी चोपड़ा पूरे परिवार सहित गुरु -भगवंतों के दर्शन किए एवं जिनवाणी श्रवण की। धर्मसभा में चेन्नई, रायचूर, यादगिरी आदि सुदूरवर्ती क्षेत्रों से एवं बेंगलुरू के उपनगरों से गौतमचन्द्र ओस्तवाल,ओमप्रकाश लुणावत,प्रकाशचन्द्र बम्ब सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। ललित कांकरिया ने संयुक्त रूप से संचालन किया।
गुरु पार्श्व पदम चातुर्मास में लगी तपस्या की झडियाँ
Highlights
- तपस्या काया से नहीं,आत्मशक्ति से होती है- डॉ.पदमचन्द्रजी म.सा

