बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप प्रांगण में आचार्य श्री पार्श्वचन्दजी म.सा. के सान्निध्य में प्रात: कालीन क्लास में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने संकल्पजा और आरंभजा हिंसा का विवेचन करते हुए कहा कि हिंसा के पीछे जुड़े भाव ही कर्मबंध की तीव्रता निर्धारित करते हैं। जैन धर्म की अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि वीरता, आत्मसम्मान और विवेक का मार्ग है। अनावश्यक हिंसा से बचना, वाणी में मधुरता रखना, दूसरों पर अपनी क्षमता से अधिक भार न डालना और अनर्थदंड से बचना भी अहिंसा का ही व्यापक स्वरूप है। भगवान महावीर की शिक्षा के अनुसार जिन हिंसात्मक कार्यों को हम न स्वयं करते हैं, न करवाते हैं और न करने का संकल्प रखते हैं, उनसे अपना संबंध समाप्त करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अहिंसा केवल बाहरी व्यवहार नहीं, बल्कि मन के भावों की शुद्धि भी है।
पूज्य श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने जीवन को दुर्गति से बचाने के लिए सप्त व्यसनों के त्याग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जुआ, शिकार, चोरी, मांसाहार, मदिरापान, वेश्यागमन और परस्त्रीगमन जैसे व्यसन मनुष्य के विवेक, चरित्र और आत्मिक शुद्धि को नष्ट करते हैं। रावण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान और शक्ति होने के बावजूद परस्त्री पर कुदृष्टि उसके पतन का कारण बनी। उन्होंने रात्रि भोजन त्याग को भी अहिंसा, संयम और स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सूर्यास्त के बाद सूक्ष्म जीवों की हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। ओसियां के लोगों की नियम-निष्ठा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दृढ़ संकल्प हो तो परिस्थितियां भी नियम के अनुकूल बन जाती हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक नियम केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक नवकार महामंत्र का जाप करना चाहिए और बच्चों में भी नवकार एवं संयम के संस्कार विकसित करने चाहिए। देव, गुरु और धर्म के प्रति सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के साथ साधना करने से कर्मों की निर्जरा होती है। व्यसनमुक्त जीवन, रात्रि भोजन त्याग और नियमित नवकार स्मरण आत्मशुद्धि के महत्वपूर्ण साधन हैं।
पूज्य श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने आठ कर्मों के लेप का दृष्टांत देते हुए कहा कि जिस प्रकार मिट्टी का लेप लगने से हल्की तुंबी पानी में डूब जाती है, उसी प्रकार आठ कर्मों का लेप आत्मा को संसार में बांधे रखता है। अठारह पापों का सेवन जीव को भारी बनाता है, जबकि संयम और धर्म का आचरण आत्मा को हल्का करता है। उन्होंने कहा कि आज का व्यक्ति शरीर के वजन को लेकर सजग रहता है, लेकिन आत्मा पर पड़ने वाले कर्मों के भार की चिंता नहीं करता। पाप का बोध अंतःकरण में होता है, इसलिए छोटे पापों के साथ स्थूल और महापापों से भी बचना चाहिए तथा पूर्व में हुए पापों के लिए पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
मुनि श्री ने आत्मघात, विश्वासघात, गुरुद्रोह, कृतघ्नता, झूठी सलाह, झूठी साक्षी, हिंसा को धर्म मानना, जलाशय सुखाना, वन में आग लगाना, वन-विनाश, बाल जीव की हत्या तथा सती-साध्वी के शील भंग जैसे 12 महापापों से बचने की प्रेरणा दी। महारंभ, महापरिग्रह और पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा को दुर्गति का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि वस्तु का होना परिग्रह नहीं, बल्कि उसके प्रति आसक्ति और ममत्व ही वास्तविक परिग्रह है। तंदुल मत्स्य के दृष्टांत से भाव-हिंसा की गंभीरता समझाते हुए उन्होंने कहा कि मन में हिंसा का तीव्र भाव भी कर्मबंध का कारण बन सकता है। अंत में श्रावक-श्राविकाओं से बारह व्रतों को अपनाकर अहिंसा, संयम, सीमित परिग्रह और सदाचार को जीवन में उतारने का आह्वान किया। सारिका देसरला ने 9 उपवास, सरोजजी फुलफगर, प्रेमलता पगारिया ने 23 उपवास, सूरजबाई छाजेड़, संदीपजी छाजेड़, अमिता नाहटा ने 24 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। मंजू नाहर एवं अक्षय श्रीश्रीमाल के 24 उपवास की तपस्या गतिमान है। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने सभी का स्वागत किया, मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया और कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी।
अहिंसा, संयम और व्यसनमुक्त जीवन से आत्मकल्याण का मार्ग : डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.

