बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में आयोजित आचार्य पार्श्वचन्दजी म.सा. के सान्निध्य में प्रात: कालीन क्लास में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचंद्रजी म.सा. ने श्रावक के बारह व्रतों की महत्ता बताते हुए कहा कि जैन धर्म एक आचार-संहिता ही नहीं,श्रेष्ठ, संयमित और संतुलित जीवन जीने की कला भी सिखाता है। आगार धर्म में श्रावक के लिए एक व्रत से लेकर बारह व्रत तक का विधान है। पांच अणुव्रत मूल गुण हैं, जबकि तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत उनके सहायक हैं। इन सभी व्रतों की आधारभूमि अहिंसा है।
उन्होंने कहा कि बारह व्रत केवल आध्यात्मिक जीवन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि परिवार, व्यवसाय, स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दैनिक जीवन को व्यवस्थित करने की प्रेरणा भी देते हैं। प्रथम अणुव्रत के संदर्भ में उन्होंने आरंभजा और संकल्पजा हिंसा का अंतर समझाया। गृहस्थ जीवन में होने वाली अनिवार्य आरंभजा हिंसा को विवेक और सावधानी से कम किया जा सकता है, लेकिन द्वेष, क्रोध या संकल्पपूर्वक की जाने वाली संकल्पजा हिंसा से बचना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि व्रत व्यक्ति को इच्छाओं पर नियंत्रण, त्याग और आत्मसंयम सिखाकर जीवन को धर्ममय बनाते हैं। बारह व्रतों का पालन केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की दिशा में बढ़ता हुआ कदम है।
वीरों का इतिहास बनता है, कायरों का नहीं : जयधुरंधरमुनिजी म.सा.
दैनिक प्रवचन में पूज्य श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने भगवान महावीर के जीवन से प्रेरणा देते हुए कहा कि आत्मा में इतनी शक्ति है कि वह पुरुषार्थ और साधना से परमात्मा बन सकती है। वीरों का इतिहास बनता है, कायरों का नहीं। भगवान महावीर से बड़ा वीर कोई नहीं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और आत्मकल्याण का मार्ग नहीं छोड़ा। ओसियां के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने आचार्य रत्नप्रभसूरिजी और राजा जयभट्ट का प्रसंग सुनाया। आचार्यश्री के आध्यात्मिक प्रभाव से राजा के पुत्र के जीवन की रक्षा हुई और राजा सहित प्रजा ने धर्म के नियम स्वीकार किए। आचार्यश्री ने राज्य और धन लेने के बजाय धर्म एवं अनुकंपा के प्रचार को ही अपना उद्देश्य बनाया।
मुनिश्री ने कहा कि सम्यक्त्व की रक्षा के लिए जीवन से सप्त कुव्यसनों को दूर करना आवश्यक है। जुआ, मद्यपान, मांसाहार, वेश्यागमन, शिकार, चोरी और परस्त्रीगमन आत्मा के पतन का कारण बनते हैं। उन्होंने जुआ और सट्टेबाजी से विशेष सावधान करते हुए कहा कि आज इनके नए रूप युवाओं और परिवारों के लिए गंभीर समस्या बन रहे हैं। सच्चे जैन श्रावक के जीवन में जीवों के प्रति दया, करुणा और अनुकंपा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें चिंतन करना चाहिए कि हम कौन हैं और हमारे पूर्वजों में कैसा शौर्य व धर्मभाव था।
भाग्य नहीं, पुरुषार्थ से कर्मों की निर्जरा : जयपुरंदरमुनिजी म.सा.
पूज्य श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने आचार्य जयमलजी म.सा. की रचना “जीवा बयांलिसी “ आधारित प्रवचन शृंखला में भगवान महावीर को ‘पुरिसुत्तमाणं’ और ‘पुरिससीहाणं’ बताते हुए कहा कि पुरुषार्थ ही वास्तविक धर्म है। जीव जितना पुरुषार्थ करता है, उतनी ही कर्मों की निर्जरा होती है। भगवान महावीर का जीवन कठिन उपसर्गों के बीच भी दृढ़ पुरुषार्थ और समता का उदाहरण रहा। ग्वाले के उपसर्ग के समय इंद्र सहायता के लिए उपस्थित हुए, लेकिन भगवान ने बाहरी सहायता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपने कर्मों का क्षय स्वयं के पुरुषार्थ और सहनशीलता से किया। मुनिश्री ने कहा कि केवलज्ञान में भविष्य को जानने के बावजूद भगवान ने पुरुषार्थ नहीं छोड़ा। इसलिए मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय वर्तमान में अपने कर्तव्य और पुरुषार्थ पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में कार्यसिद्धि के लिए काल, स्वभाव, नियति, कर्म और पुरुषार्थ-इन पांच समवायों का समन्वय माना गया है। भगवान महावीर और गोशालक के प्रसंग के माध्यम से कि केवल नियति को ही सब कुछ मान लेना एकांतवाद है। राजा श्रेणिक एवं द्वारिका नगरी के नाश के प्रसंग से भी स्पष्ट किया कि नियति को कोई बदल नहीं सकता, लेकिन पुरुषार्थ करते रहना चाहिए| मुनिश्री ने कहा कि एकेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा तथा उनके कर्मबंध की तीव्रता में अंतर है। विशेष रूप से पंचेन्द्रिय जीवों की जानबूझकर की गई हिंसा गंभीर पाप है। हिंसा में बाहरी क्रिया के साथ भावों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
16 सतीतप साधना की पूर्णाहुति गुरुवार 20 अगस्त को होने जा रही है। रस अवसर पर सरोज फुलफगर ने 22 उपवास ओर सारिका देशरला ने 8 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इसके अतिरिक्त 4 भाई-बहन भी मासखमण की तपस्या की ओर अग्रसर है। रायचूर, हैदराबाद,चेन्नई,बागलकोट आदि क्षेत्रो से दर्शनार्थी पधारे। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने सभी का स्वागत किया, मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया और कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी।

