विलेपार्ले {मुंबई} विकास धाकड़/आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी सुशिष्या साध्वीश्री राकेश कुमारी जी आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का सफल एवं प्रेरणादायी आयोजन किया गया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महासभा के निर्देशन में आयोजित इस कार्यशाला के मुख्य वक्ता दिलीप जी सरावगी थे। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वीश्री जी के नवकार मंत्र से हुआ। इसके पश्चात साध्वीवृंद द्वारा “भिक्षु म्हारे प्रगट्या जी” एवं “सुगुरु को वंदन बारंबार” गीतिकाओं का सामूहिक संगान किया गया, जिससे वातावरण भक्तिमय बन गया। तत्पश्चात रेणु जी कोठारी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।
अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए दिलीप जी सरावगी ने एक लघु ध्यान (मेडिटेशन) से करवाया। उन्होंने कहा कि आज की यह कार्यशाला तेरापंथ को जानने के साथ ही स्वयं को पहचानने और अपने भीतर झाँकने का भी एक अवसर है। प्रसिद्ध पंक्ति, “मैं अकेला ही चला था गालीब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया” से अपनी बात प्रारंभ करते हुए उन्होंने आचार्य भिक्षु के जीवन-दर्शन और तेरापंथ की स्थापना के उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि आचार्य भिक्षु का उद्देश्य कोई नया संप्रदाय खड़ा करना नहीं था, बल्कि भगवान महावीर की वाणी के अनुरूप शुद्ध आचरण को जीवन में स्थापित करना था। आचार्य भिक्षु ने त्याग, तपस्या और सत्य की नींव पर तेरापंथ का आधार रखा। उन्होंने “आज्ञा ही धर्म है”, “साध्य-साधन की पवित्रता”, “दान” और “दया” जैसे तेरापंथ के मूल सिद्धांतों को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली भाषा में समझाया। संस्मरणों और प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने कार्यशाला को अत्यंत रोचक, ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी बना दिया, जिससे सभी सहभागी पूरे समय उत्साहपूर्वक जुड़े रहे।
अंत में साध्वीश्री राकेश कुमारी जी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि दिलीप जी ने अत्यंत सरल भाषा में आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों को सभी के समक्ष प्रस्तुत किया। आचार्य भिक्षु सत्य के परम उपासक थे। उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन कर उनमें से नवनीत स्वरूप तत्वों को ग्रहण किया और त्याग एवं तपस्या की सुदृढ़ नींव पर तेरापंथ की स्थापना की। उत्तरवर्ती आचार्य परंपरा ने भी उन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाया है और वर्तमान में आचार्य महाश्रमण जी भी उसी धर्मधारा को सशक्त रूप से प्रवाहित कर रहे हैं।
साध्वीश्री जी के सान्निध्य में आचार्य भिक्षु के 300वें जन्मवर्ष संपन्नता के उपलक्ष्य में श्रद्धाभाव से स्वामीजी की अभिवंदना एवं अभ्यर्थना कर श्रद्धा का अर्घ्य अर्पित किया गया। साध्वीश्री जी ने अपने वक्तव्य को विराम देते हुए कहा, “तेरापंथ को जाने बिना वह ‘मेरा पंथ’ नहीं बन सकता। जब हम तेरापंथ के सिद्धांतों को समझेंगे, आत्मसात करेंगे और अपने जीवन में उतारेंगे, तभी वह वास्तव में ‘मेरापंथ’ बन पाएगा। साध्वीश्री जी के मंगलपाठ के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। दीपक जी डागलिया ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया। विलेपार्ले, सांताक्रूज, अंधेरी सहित विभिन्न क्षेत्रों से अच्छी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं की उत्साहपूर्ण उपस्थिति रही।

