बस्ती (उ.प्र.)। बहादुरपुर ब्लॉक स्थित ऐतिहासिक मनोरमा नदी तट पर 3 जुलाई को ‘महुआ डाबर नरसंहार स्मृति दिवस’ के अवसर पर महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। इस अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम के उन हजारों अमर बलिदानियों को नमन किया जाएगा, जिन्होंने 3 जुलाई 1857 को अंग्रेजी हुकूमत के दमन का सामना करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।
महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक डॉ. शाह आलम राना ने बताया कि 3 जुलाई 1857 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अत्यंत पीड़ादायक और महत्वपूर्ण दिन है। अंग्रेजी सेना ने महुआ डाबर गांव को तीन ओर से घेरकर हजारों निर्दोष ग्रामीणों का निर्मम नरसंहार किया और इसके बाद पूरे गांव को आग के हवाले कर उसे सरकारी अभिलेखों में ‘गैरचिरागी’ घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि यह घटना 1857 की क्रांति के सबसे बड़े जनसंहारों में से एक है, लेकिन इसे इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसकी यह हकदार है। डॉ. राना ने कहा कि महुआ डाबर के शहीदों का बलिदान राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि ब्रिटेन सरकार इस ऐतिहासिक जनसंहार के लिए औपचारिक माफी मांगे तथा रॉयल ट्रेजरी में सुरक्षित भारत की ऐतिहासिक धरोहर और लूटी गई सामग्री वापस करे।
उन्होंने यह भी मांग उठाई कि 1857 में अंग्रेजों का साथ देने वाले गद्दारों की संपत्तियों को ‘शत्रु सम्पत्ति अधिनियम’ की तर्ज पर जब्त करने के लिए केंद्र सरकार आवश्यक कदम उठाए। साथ ही महुआ डाबर के हजारों शहीदों की स्मृति में एक भव्य ‘शहादत कॉरिडोर’ विकसित कर इसे पर्यटन, शोध और रोजगार से जोड़ा जाए, ताकि यह स्थल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त कर सके।
उन्होंने केंद्र सरकार से संसद में विशेष विधेयक लाकर 1857 के शहीद परिवारों के सम्मान, संरक्षण और पुनर्वास के लिए विशेष कानून बनाने की मांग की। साथ ही UP बोर्ड और NCERT की इतिहास पुस्तकों में ‘महुआ डाबर नरसंहार’ को शामिल करने तथा 3 जुलाई को ‘महुआ डाबर बलिदान दिवस’ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर घोषित कर प्रतिवर्ष मनाने की अपील की। डॉ. राना ने कहा कि महुआ डाबर केवल एक गांव नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी कुर्बानियों का प्रतीक है। यदि यहां शहादत कॉरिडोर और विश्वस्तरीय स्मारक का निर्माण होता है, तो यह नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, बलिदान और स्वाभिमान की प्रेरणा देने वाला ऐतिहासिक केंद्र बनेगा। उन्होंने बताया कि महुआ डाबर संग्रहालय के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप इस ऐतिहासिक स्थल को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में शामिल किया गया है। राज्य सरकार द्वारा यहां लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में भव्य एवं जीवंत स्मारक विकसित करने की घोषणा भी की गई थी, किंतु अब तक कोई भी योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है। स्मृति दिवस कार्यक्रम में इतिहासकार, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक शामिल होकर शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।
महुआ डाबर नरसंहार: 1857 की सबसे बड़ी कुर्बानी को दिलाने की मांग, शहीदों को दी जाएगी श्रद्धांजलि

