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Reading: लब्धि अथवा क्षमता न हो दुरुपयोग : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
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लब्धि अथवा क्षमता न हो दुरुपयोग : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: June 21, 2026 1:07 am
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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Highlights
  • पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री सत्येन्द्र जैन ने किए आचार्यश्री के दर्शन, प्राप्त किया मंगल आशीष
  • अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के शिखरोत्सव को शांतिदूत से मंगल आशीर्वाद
  • दो मुनिजनों को आचार्यश्री ने स्वयं प्रदान किए सर्टिफिकेट
  • साध्वीप्रमुखाजी ने भी इस कार्यक्रम को किया उद्बोधित

लाडनूं । जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में बने भव्य एवं विशाल सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘मनुष्य जन्म सुलब्ध बने’ विषय को व्याख्यायित करते हुए कहा कि साधु से संवाद होता है और उससे कुछ बोध मिलता है तो संवाद कितना सार्थक हो जाता है। दिन-रात में आदमी कितनों से वार्तालाप करता है, किन्तु साधु से कोई आध्यात्मिक वार्तालाप हो और साधु कुछ विशेष ज्ञान दे दे तो वार्तालाप कितना सफल-सुफल बन जाता है।
दो शब्द हैं-सफल और सुफल। सफलता भी अच्छा शब्द है, किन्तु सुफलता का अर्थ होता है अच्छा फल प्राप्त हो गया। मनुष्य जन्म तो कईयों को मिलता है, लेकिन उसका वह जन्म सुलब्ध हो जाए, वह बहुत बड़ी बात होती है। जो ऋषि बन गए, संत बन गए और जीवन भर अच्छी साधना करते हैं तो उस सीमा में उनका मनुष्य जीवन सुलब्ध हो जाता है। साधु साधना करता है तो लब्धियां और उपलब्धियां भी होती हैं। साधु की मूल उपलब्धि तो समता की साधना, मोक्ष की प्राप्ति होती है। वीतरागता के सामने तो और लब्धियां और सिद्धियां तो मानों नाकुछ के समान होता है। प्राप्त लब्धियों का दुरुपयोग तो होना ही नहीं चाहिए, अनावश्यक प्रयोग अथवा प्रदर्शन भी नहीं होना चाहिए।
किसी भी प्रकार की लब्धि अथवा क्षमता का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। उसके दुरुपयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। त्यागी, तपस्वी मुनि अपने आप में सनाथ हो जाता है। धर्म भी एक बड़ा बान्धव है। धर्म को बहुत बड़ा भाई कहा गया है। जो असहाय होते हैं, उनका सहायक यह जैन धर्म है। जो तीर्थंकर हैं, उनके मार्ग में स्थित होने से, अध्यात्म के मार्ग में स्थित हो जाने से आदमी का जीवन सुलब्ध हो जाता है। तीर्थंकरों की अपनी पुण्यवत्ता भी होती है। तीर्थंकर प्रवचन वाले होते हैं। केवली के लिए व्याख्यान/प्रवचन करना आवश्यक नहीं होता। तीर्थंकर परिश्रम करने वाले और प्रवचन देने वाले होते हैं। उनके प्रवचन से कितनों-कितनों को लाभ प्राप्त हो सकता है। आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने कितने-कितने प्रवचन किए हैं। अब तो दूरस्थ बैठे हुए भी लोग यहां हो रहे प्रवचन को सुन सकते हैं।

साधु जिन धर्म के मार्ग में स्थित हैं। जिसको यह व्रत मिल गया है, उसके जीवन में मनुष्य जन्म की सुफलता की बात हो सकती है। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र और तप की आराधना है, उससे मनुष्य जन्म सुलब्ध तो बन ही जाता है। आचार्यश्री भिक्षु इस तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता हुए। भिक्षु चेतना वर्ष चल रहा है। उनका जन्म कंटालिया गांव में हुआ था। वे धर्म के मार्ग पर आगे बढ़े और घर से अभिनिष्क्रमण कर घर-बार छोड़ दिए। पुनः निष्क्रमण करते हुए नव्य-भव्य दीक्षा ली और फिर नया पंथ शुरु हो गया। उनसे ही जुड़ा हुआ तेरापंथ शासन है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित दिल्ली के पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री सत्येन्द्र जैन ने अपनी अभिव्यक्ति दी तथा आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल द्वारा ‘शिखरोत्सव’ कार्यक्रम का मंचीय उपक्रम रहा। इसमें अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की संरक्षिका श्रीमती पुष्पा बैंगानी, राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा व श्री सुमतिचंद गोठी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

इस दौरान आचार्यश्री ने अपने करकमलों से मुनि निकुंजकुमारजी व मुनि आगमकुमारजी अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल द्वारा चलाए जा रहे छहवर्षीय पाठ्यक्रम से संदर्भित सर्टिफिकेट प्रदान किए। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि स्वाध्याय को बड़ा धर्म कहा गया है। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल ज्ञान के क्षेत्र में अच्छा प्रयास करती रहे। इस संदर्भ में साध्वी जिनप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वीप्रमुखाजी ने अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के इस कार्यक्रम के संदर्भ में उद्बोधन प्रदान किया।

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