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Reading: विनय, श्रुत, तपः व आचार समाधि से चित्त में शांति व निर्मलता की प्राप्ति : शांतिदूत महाश्रमण
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विनय, श्रुत, तपः व आचार समाधि से चित्त में शांति व निर्मलता की प्राप्ति : शांतिदूत महाश्रमण

Last updated: February 10, 2026 12:51 am
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • चारित्रात्माओं ने दी भावनाओं को अभिव्यक्ति, आचार्यश्री ने प्रदान किया मंगल आशीष
  • मुमुक्षु बहनों ने भी गीत के माध्यम से की गुरुचरणों की अभिवंदना

लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी, तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाधिशास्ता पूजनीय आचार्यश्री तुलसी की जन्मस्थली, दीक्षाभूमि व कुछ अंशों में कर्मभूमि के रूप में विख्यात लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष के लिए तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान धिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का पावन प्रवेश हो चुका है। योगक्षेम वर्ष के लिए बहिर्विहार से साधु-साध्वियों का आगमन के साथ-साथ श्रावक-श्राविकाएं भी देश-विदेशों से पहुंच रहे हैं।
सोमवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित श्रद्धायुक्त श्रद्धालुओं को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि चार समाधियां बताई गई हैं- विनय समाधि, श्रुत समाधि, तपः समाधि और आचार समाधि। ये चार चीजें ऐसी हैं, जिनके आसेवन से समाधि की प्राप्ति हो सकती है। चित्त में शांति और निर्मलता की संप्राप्ति हो सकती है, विकास हो सकता है। आदमी अंहकार से बचे, घमण्ड में न जाए और विनय भाव रखे तो चित्त में शांति, समाधि और प्रफुल्लता भी रह सकती है।
विचार से घमण्ड, भाषा में घमण्ड को अभिव्यक्त करना, शरीर की गतिविधि में भी घमण्ड दिखाई देता है तो उसका संबंध भी भीतर के भावों से हो सकता है। भीतर में जैसे भाव होते हैं, वैसी ही अभिव्यक्ति भी होती है। जो भीतर में होता है, वह अदृश्य होता है, किन्तु जो बाहर दिखाई देता है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भीतर में भी वही चल रहा है। जैसा भाव भीतर होता है, वहीं कार्य बाहर दिखाई दे सकता है। भीतर के भाव ही शरीर के अंगों से प्रगट होते हैं अथवा हो सकते हैं। जैसे कोई आदमी भयभीत हो जाता है तो उसके चेहरे की मुद्रा बदल जाती है। कोई आदमी चिंता में होता है, कोई आलस्य में होता है तो उसके अनुरूप ही उसके शरीर की स्थिति हो जाती है। इसी प्रकार स्नेह अथवा आक्रोश की भावना चेहरे पर अथवा आंखों से दिखाई दे सकती है।
जो आदमी अहंकार भाव को दूर करे और मार्दव भाव को रखे, विनय का भाव रखे तो चित्त में समाधि रह सकती है। विनीत होता है वह सुखी और अविनीत आत्मा दुःखी बन जाती है। विनय रखने वाला शिक्षा को भी प्राप्त कर सकता है। विनय भी एक प्रकार से समाधि की प्राप्ति का उपाय है। इसी प्रकार आदमी को श्रुत की साधना भी करने का प्रयास करना चाहिए। साधु-साध्वियों को जितना संभव हो सके, आगमों का स्वाध्याय करने का प्रयास होना चाहिए। हमारे यहां 32 आगम मान्य हैं। मन यदि स्वाध्याय में लग जाता है तो मन की एकाग्रता का भी विकास संभव हो सकता है। आदमी अपनी समाधि को अपने हाथ में रखने का प्रयास करे तो बहुत अच्छी बात हो सकती है।
इस प्रकार विनय, श्रुत, तपः और आचार- इन समाधियों की साधना से चेतना निर्मलता को प्राप्त कर सकती है। आज से साधु-साध्वियों के अपने भक्तिभावों को प्रस्तुत करने का अवसर मिला तो सबसे पहले साध्वी कल्पलताजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि विजयकुमारजी ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए अपने सहयोगी संतों के साथ गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने उन्हें भी मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि गौरवकुमारजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीष प्रदान किया। मुमुक्षु बहनों ने गीत का संगान किया। साध्वी कार्तिकयशाजी ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। आचार्यश्री ने उन्हें भी मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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