राघवेंद्र प्रताप सिंह, कैसरगंज, बहराइच (यूपी)। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में आदमखोर भेड़ियों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा। महसी तहसील से शुरू हुआ यह खौफ अब पड़ोसी कैसरगंज तहसील तक फैल चुका है। पिछले 15 दिनों में मझारा तौकली और आसपास के क्षेत्रों में भेड़ियों ने चार मासूम बच्चों को अपना निवाला बना लिया, जबकि डेढ़ दर्जन से अधिक ग्रामीण घायल हो चुके हैं। घने गन्ने के खेतों की आड़ में छिपते इन खूंखार जंगली जानवरों ने इलाके को दहशत की चपेट में ले लिया है। ग्रामीण रात-रात भर लाठियां थामे जागते रहते हैं, लेकिन वन विभाग की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं।
घटनाओं का सिलसिला 9 सितंबर को परगपुरवा गांव से शुरू हुआ, जब एक चार वर्षीय मासूम बच्ची ज्योति भेड़िये का शिकार बनी। अगले दिन उसका क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। इसके दो दिन बाद, 11 सितंबर की भयावह रात को बहोरवा गांव में एक मां की गोद से मात्र तीन माह की नवजात संध्या को भेड़िये ने छीन लिया। मां की चीखें आकाश छू गईं, लेकिन ग्रामीण पहुंचे तो भेड़िया अंधेरे में गुम हो चुका था। बाद में बच्ची का शव, ब्रेसलेट और कपड़े ही मिले। 13 सितंबर को एक अधेड़़ महिला पर हमला हुआ, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गई। 20 सितंबर को दिनदहाड़े तीन ग्रामीणों पर भेड़िये ने धावा बोला। बहन के पास बैठे अपने भाई को उठा ले गया, जिसका शव आज तक नहीं मिला। सबसे ताजा और दिल दहला देने वाली घटना 24 सितंबर की है, जब कैसरगंज तहसील के बाबा बंगलवा पुरवा गांव में घर के आंगन में खेल रही तीन वर्षीय बच्ची सोनी को भेड़िये ने निवाला बना लिया। ग्रामीणों ने पीछा कर बच्ची को भेड़िये के जबड़ों से छुड़ा लिया, लेकिन देर हो चुकी थी। बच्ची की मौत हो गई। वही 25 सितंबर को मझारा तौकली के देवनाथ पुरवा में विजय कुमार के आठ वर्षीय पुत्र अनिकेश को भी भेड़िये ने उठा लिया आनंद फाइनल में ग्रामीणों ने उसको सीएससी पर पहुंचा। लगातार हो रही इन घटनाओं से पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया है। गुस्साए ग्रामीणों ने वन विभाग की गाड़ी तक तोड़फोड़ कर दी। बहराइच का यह क्षेत्र गन्ने की प्रमुख पैदावार वाला है, जहां चारों ओर घने गन्ने के खेत ही नजर आते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही घनी छांव भेड़ियों के लिए आदर्श छिपने की जगह बन गई है। रात में होने वाले ज्यादातर हमलों के लिए यह परफेक्ट कवर प्रदान करती है। वन विभाग की थर्मल ड्रोन, नाइट विजन कैमरों और कैमरा ट्रैप जैसी आधुनिक तकनीकें भी गन्ने की वजह से नाकाम साबित हो रही हैं। ड्रोन तक इन घने खेतों में घुस नहीं पाते। वन विभाग ने अब तक 20 से अधिक टीमें और 100 से ज्यादा कर्मियों को तैनात किया है, लेकिन भेड़िये को पकड़ने में कोई सफलता नहीं मिली। इसके अलावा 21 पंचायतों और ग्रामीण विकास विभाग की टीमें ग्रामीणों को जागरूक कर रही हैं। कंट्रोल रूम स्थापित कर तीन जिलों में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। फिर भी, भेड़ियों और तेंदुओं की लगातार साइटिंग से दहशत बढ़ती जा रही है। ग्रामीण लाठी-डंडे थामे ‘जागते रहो’ का नारा लगाते हुए रात भर जाग रहे हैं, खासकर बच्चों की सुरक्षा के लिए। कई गांवों में सोलर सीसीटीवी और ट्रैपिंग केज लगाए गए हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि ये उपाय अपर्याप्त हैं। कैसरगंज विधायक आनंद यादव ने ‘शूट एट साइट’ के आदेश की मांग की है। उन्होंने कहा, “ग्रामीणों की जान पर बनी हुई है। वन्यजीव संरक्षण के नाम पर मानव जीवन को दांव पर न लगाया जाए। तत्काल कड़े कदम उठाए जाएं।” जिला मजिस्ट्रेट अक्षय त्रिपाठी ने मझारा तौकली और प्रभावित गांवों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों से बातचीत के दौरान उन्होंने आश्वासन दिया कि विशेषज्ञ टीमें अन्य राज्यों से बुलाई गई हैं और स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है।
डीएफओ राम सिंह यादव ने बताया, “हम थर्मल ड्रोन, कैमरा ट्रैप और नाइट विजन का इस्तेमाल कर रहे हैं। जल्द ही भेड़ियों को पकड़ लिया जाएगा।” लेकिन ग्रामीणों का विश्वास डगमगा रहा है। एक प्रभावित ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हर रात डर लगता है। बच्चे घर से बाहर नहीं निकल पाते। वन विभाग कब तक खाली हाथ लौटेगा?” यह पहली बार नहीं है जब बहराइच में ऐसा कहर देखने को मिला है। पिछले साल भी महसी क्षेत्र में 10 से अधिक बच्चों की मौत भेड़ियों के हमलों में हो चुकी थी। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और आवास ह्रास के कारण वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। गन्ने के खेतों में चूहों और अन्य शिकार की प्रचुरता भेड़ियों को आकर्षित कर रही है। लेकिन सवाल यही है- कब तक ग्रामीण इस दहशत के साये में जीने को मजबूर रहेंगे? प्रशासन की कोशिशें कितनी कारगर साबित होंगी, यह समय ही बताएगा। फिलहाल, बहराइच के ये शांत गांव भय के काले बादलों से घिरे हुए हैं।
बहराइच में भेड़ियों का कहर, 15 दिनों में चार मासूमों की मौत, ग्रामीण दहशत के साये में जीने को मजबूर
