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Reading: बंधन का कारण है आसक्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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बंधन का कारण है आसक्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: August 13, 2025 6:17 pm
Surabhi Saloni
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6 Min Read
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Highlights
  • पूज्य सन्निधि में तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के त्रिदिवसीय समारोह का शुभारम्भ
  • देश-विदेश के 550 क्षेत्रों से करीब 1800 प्रतिनिधि बने हुए हैं संभागी
  • समाज को बहुत अच्छी सेवा प्रदान कर रही है महासभा : अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण
  • मुख्यमुनिश्री ने संभागी प्रतिनिधियों को किया उत्प्रेरित

कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। गुजरात राज्य की राजधानी गांधीनगर के कोबा क्षेत्र में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती, जहां जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्ष 2025 का चतुर्मास सुसम्पन्न कर रहे हैं। आचार्यश्री के चातुर्मासिक प्रवेश के साथ तेरापंथ समाज के संगठनों व संस्थाओं के वार्षिक अधिवेशन, सम्मेलन, समारोह, गोष्ठियों, शिविरों आदि के आयोजनों का क्रम प्रारम्भ हो गया था, जो अभी भी निरंतर जारी है। इस क्रम में बुधवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में ‘संस्था शिरोमणि’ व तेरापंथ समाज की मां जैसी उपमाओं से विभूषित जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का भव्य शुभारम्भ हुआ। महासभा के पदाधिकारियों व संभागी प्रतिनिधियों ने अपने आराध्य से मंगलपाठ का श्रवण किया तो उसके साथ ही इस त्रिदिवसीय सम्मेलन का शुभारम्भ हो गया। शुभारम्भ सत्र के उपरान्त देश-विदेश के लगभग 550 से अधिक सभा व उपसभाओं के लगभग 1800 प्रतिनिधि अपने आराध्य की अमृतवाणी का श्रवण करने के लिए ‘वीर भिक्षु समवसरण में पहुंचे।
नित्य की भांति तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में समुपस्थित श्रद्धालुओं व ‘तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन’ में संभागी बन रहे प्रतिनिधियों को ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जो आदमी आसक्ति में प्रवृत्त होता है, पदार्थों के प्रति राग व मोह का भाव रखता है, वह व्यक्ति बार-बार दुःख को प्राप्त होता है। आसक्ति बंधन का कारण है और आसक्ति से मुक्ति की साधना जीव के मुक्ति का साधन है। साधना के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है कि अनासक्ति का भाव रखो। भोजन करना है तो अनासक्ति का भाव होना चाहिए। मनोज्ञ पदार्थ आ गया तो बहुत ज्यादा खुशी नहीं और अमनोज्ञ की ज्यादा निंदा भी नहीं करना। आसक्ति, प्रशंसा आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। अमनोज्ञ पदार्थ आ जाए तो उसमे भी समता का भाव रखने का प्रयास होना चाहिए। इसी प्रकार जहां कहीं भी आसक्ति का भाव आता है, आदमी बंधन के जाल में जकड़ता जाता है।
साधु के जीवन में संयम की साधना तो रहनी ही चाहिए, गृहस्थ जीवन में संयम, सादगी व अनासक्ति का अभ्यास करते रहना चाहिए। व्यवसाय आदि में नैतिकता, हिंसा से बचो, नशे से बचो, सांप्रदायिक असहिष्णुता मत करो आदि ये नियम धर्म से जुड़े हुए हैं। अणुव्रत में संयम और नैतिकता की बात होती है। प्रेक्षाध्यान में भी वीतरागता की बात है। धर्म और अध्यात्म की साधना अनासक्ति की आराधना ही होती है। इसलिए आदमी को अनासक्ति की चेतना को पुष्ट बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। अनासक्ति में रहते हुए आदमी कभी परम सुख को भी प्राप्त कर सकता है। पावन पाथेय के उपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री ने आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यानमाला के क्रम को आगे बढ़ाया। तदुपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में ‘संस्था शिरोमणि’ जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित ‘तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। महासभा के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि विश्रुतकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने संभागी प्रतिनिधियों को उद्बोधित किया।
तत्पश्चात तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने संभागी प्रतिनिधियों को पावन आशीष प्रदान करते हुए कहा कि ‘तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन’ का यह सुन्दर अवसर है। यह वर्ष परम पूजनीय आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी का वर्ष है। तेरापंथी सभाएं तेरापंथ समाज में एक लोकल स्तर पर बहुत गरिमापूर्ण संस्थाएं होती हैं। वे तेरापंथ समाज का नेतृत्व करने वाली होती हैं। साधु-साध्वियों, समणियों के प्रवास आदि से लोकल रूप में जुड़ी हुई होती हैं। कहीं उपसभाएं भी होती हैं। इनसे क्षेत्रों की सार-संभाल में सुविधा होती है। सभाएं और उपसभाएं होती हैं तो कार्य में व्यवस्थित रूप हो सकता है। तेरापंथी महासभा एक केन्द्रीय संस्था है और केन्द्रीय संस्थाओं में भी ‘संस्था शिरोमणि’ का गरिमापूर्ण दर्जा भी प्राप्त है। इसका बहुत ही विशाल नेटवर्क है। सेवा साधक श्रेणी भी महासभा का महत्त्वपूर्ण उपक्रम है। यह संगठन के लिए बहुत अच्छा है। सभी की अपनी धार्मिक चर्या भी चले। सामायिक का क्रम रहे, खान-पान की शुद्धि रहे, एक अच्छा सदाचार का क्रम रहे और इसके साथ श्रावकत्व भी है तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। श्रावक संदेशिका पुस्तक को पढ़ने से बहुत-सी जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं। उसे यदा-कदा पढ़ते रहें। सामाजिक दृष्टि से महासभा का बहुत बड़ा दायित्व है। इन वर्षों में महासभा बहुत अच्छी सेवा समाज को प्रदान कर रही है। इसका व्यक्तित्व भी निखार को प्राप्त हुआ है। सभाएं महासभा की अंग हैं। यह सभा प्रतिनिधि सम्मेलन हो रहा है। सभी में धर्म की जागरणा बनी रहे। सभाएं और उपसभाओं से समाज का संगठन मजबूत होता है। सभी अच्छा कार्य करते रहें। आचार्यश्री से आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त कर संभागी मानों नवीन ऊर्जा का अनुभव कर रहे थे। आचार्यश्री के मंगलपाठ के साथ यह प्रेरणा सत्र सुसम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम का संचालन महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद ने किया।

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