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शुद्ध, नित्य व शाश्वत है अहिंसा आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: July 25, 2025 8:02 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • श्रद्धालुओं को अहिंसा रूपी धर्म पालन करने को आचार्यश्री ने किया अभिप्रेरित
  • साध्वीवर्याजी ने भी श्रद्धालुओं को किया उद्बोधित

कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी नित्य प्रति श्रद्धालु जनता को अपनी अमृतवाणी से आगमवाणी का रसपान करा रहे हैं। इसके साथ ही आचार्यश्री ‘तेरापंथ प्रबोध’ का संगान व उसके सरस व्याख्यान से भी लाभान्वित कर रहे हैं। अपने आराध्य के श्रीमुख से नित्य आगमवाणी की व्याख्या का श्रवण करने के लिए न केवल अहमदाबाद की जनता, अपितु देश-विदेश से श्रद्धालु उपस्थित हो रहे हैं। गुरुवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ के विशाल मंच से महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि यह अहिंसा धर्म, शुद्ध, नित्य, शाश्वत व लोक को जानकर प्रवेदित है। अहिंसा शुद्ध इसलिए है कि इसमें राग-द्वेष नहीं है। जहां राग-द्वेष की भावना होती है, वहां अशुद्धता की बात हो सकती है। जहां और जिस सिद्धांत में राग व द्वेष नहीं है, वह सिद्धांत, आचरण सम्यक्त्व युक्त है, वह अपने आप में शुद्ध हो सकता है। अहिंसा राग-द्वेष रहित है। जहां राग हो अथवा द्वेष हो तो वहां शुद्धता में कमी की बात हो सकती है।
हिंसा द्रव्य हिंसा हो सकती है, भाव हिंसा हो सकती है और दोनों भाव में हिंसा होती है। द्रव्य हिंसा में प्राणी का मरण तो होता है, लेकिन संबंधित व्यक्ति को पाप नहीं लगता है। भाव हिंसा में प्राणी न भी मरे तो भी संबद्ध व्यक्ति को पाप लगता है। द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा दोनों होता है तो प्राणी भी मरता है और वधक व्यक्ति को पाप भी लगता है। एक साधु जो पूर्ण जागरूकता के साथ चल रहा है, किन्तु चलते-चलते उसके पैर के नीचे आकर कोई प्राणी मर भी जाए तो उस साधु को कोई पाप नहीं लगता है। वहीं कोई शिकारी अपने शस्त्र से तीर छोड़ दे, लेकिन किसी प्राणी की हत्या न भी तो भी उसे हत्या का पाप लगता है।

इसलिए शास्त्र में अहिंसा को परम धर्म भी कहा गया है। सर्वप्राणापाति विरमण के रूप में अहिंसा का होना तो बहुत ऊंची बात होती है। अहिंसा महाव्रत का पालन करने वाले साधु धन्य होते हैं। साधु सर्व हिंसा का त्याग करने वाले होते हैं। आम आदमी को भी अपने जीवन में हिंसा का त्याग रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी यह विचार करे कि मैं साधु जैसे अहिंसा महाव्रत को स्वीकार नहीं कर सकता हूं तो अपने जीवन में अणुव्रतों स्वीकार करने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आदमी के लिए जितनी संभव हो सके, अहिंसा की साधना करते रहने का प्रयास करना चाहिए।
जो आत्मज्ञ हैं, उन्होंने अहिंसा को धर्म बताया है। इस प्राणी जगत को जानकर अर्हतों ने अहिंसा को धर्म बताया है। अर्हत् धर्म के अधिकृत प्रवत्ता आदमी को वेत्ता और प्रवक्ता बनने का प्रयास करना चाहिए। सामने उपासक श्रेणी के लोग उपस्थित हैं। ज्ञान हो जाए तो प्रवचन करना प्रवक्ता बनना भी सुविधाजनक हो सकता है। आगम वाणी को जहां तक हो सके, अपने जीवन में पालने का प्रयास करें तो सभी के लिए कल्याणकारी हो सकता है।आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के ‘तेरापंथ प्रबोध’ का संगान और व्याख्यान भी किया और जनता को लाभान्वित किया। आचार्यश्री के पावन पाथेय के उपरान्त साध्वीवर्याजी ने भी जनता को उद्बोधित किया। तपस्वियों ने महातपस्वी आचार्यश्री के श्रीमुख से अपनी-अपनी धारणानुसार तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया। श्री पारसमल दूगड़, डॉ. अमित बाबेल, डॉ. रूचि खाब्या ने अपनी-अपनी अभिव्यक्ति दी।

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