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Reading: अहिंसा के प्रति बनी रहे साधु की सचेष्टता : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
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अहिंसा के प्रति बनी रहे साधु की सचेष्टता : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: July 24, 2025 1:43 am
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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Highlights
  • आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अहिंसा व सेवा प्रति जागरूक रहने को किया अभिप्रेरित
  • साध्वीप्रमुखाजी ने भी जनता को किया उद्बोधित
  • उपासक शिविर सम्पन्न, उपासक श्रेणी ने अपने आराध्य के समक्ष दी भावनाओं को अभिव्यक्ति
  • उपासक श्रेणी का अच्छा विकास और अच्छा उपयोग हो : आचार्यश्री महाश्रमण

कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, युगप्रधान, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को समुपस्थित जनता व चारित्रात्माओं को अहिंसा के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा प्रदान करने के साथ सेवा आदि के संदर्भ में अभिप्रेरित किया। वहीं आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आज उपासक श्रेणी के शिविर का समापन हुआ तो उपासक सेमिनार का शुभारम्भ हुआ। इस संदर्भ मंे आचार्यश्री ने उपासक श्रेणी को मंगल पाथेय प्रदान किया। तो उपासक श्रेणी ने भी अपनी भावनाओं को प्रस्तुति दी। बुधवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालु जनता को तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के चौथे अध्ययन के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि अहिंसा व्यापक धर्म है। विभिन्न संप्रदाय दुनिया में हैं, जो धर्म से जुड़े हुए हैं। उनमें से ऐसे कौन ऐसा संप्रदाय होगा, जो अहिंसा को पूर्णतया नकार देता हो। अनेकानेक संप्रदायों में अहिंसा की बात बताई गई है। जैन धर्म में सूक्ष्मता से भी अहिंसा का निरूपण किया गया है। आयारो आगम में बताया गया है कि जो अतीत में अर्हत भगवंत हुए हैं, जो वर्तमान में हैं और वे जो बाद में होंगे वे ऐसा कहते हैं कि सभी प्राण, सभी भूत, सभी जीव और सत्व हन्तव्य नहीं हैं।

उनका हनन नहीं करना चाहिए, उन पर शासन नहीं करना चाहिए, उन्हें दास नहीं बनाना चाहिए और उनका परिताप नहीं करना चाहिए। प्राण, भूत, जीव और सत्व- इन चार भागों में संसार के सभी जीवों को विभाजित किया गया है। सभी जीवों के प्रति अहिंसा की चेतना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। साधु-साध्वियां तो अहिंसा के पुजारी हैं। उनके आचरणों में अहिंसा होनी ही चाहिए। जो साधु तन, मन व वचन से किसी को दुःख नहीं देते हैं, वैसी चारित्रात्मा के दर्शन मात्र से पाप झड़ जाते हैं। साधु तो प्राणियों का कल्याण करने का प्रयास करें। जितना संभव हो सके, पूर्ण जागरूकता के साथ अहिंसा का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। कहीं बैठना है तो रजोहरण और प्रमार्जनी से स्थान को साफ कर लेना चाहिए, किसी सू़क्ष्म जीव की हिंसा भी न होने पाए। चलना भी है तो साधु इर्या समिति का पालन करना चाहिए, देख-देखकर सावधानी से चलने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिलेखन की प्रक्रिया भी अहिंसा के प्रति जागरूकता के लिए होती है। कदाचित कोई प्रतिलेखन नहीं हुआ तो उसकी आलोयणा लेनी चाहिए। दोनों समय का प्रतिक्रमण मानों स्नान के समान है। प्रतिक्रमण को छोड़ना नहीं चाहिए। गोचरी-पानी में पूर्ण सावधानी रखने का प्रयास करना चाहिए। सहज मंे जो मिल जाए, उसी पदार्थ गोचरी करने का प्रयास होना चाहिए।

साधुचर्या की अहिंसा बहुत सूक्ष्म है। इसलिए इसके प्रति साधु की सचेष्टता बनी रहे, यह काम्य है।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए समुपस्थित चारित्रात्माओं को अनेकानेक प्रेरणाएं व पाथेय प्रदान किए। साध्वी निर्वाणश्रीजी ने शांतिदूत आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने तेरापंथ धर्मसंघ की सेवा की भावना को व्याख्यायित किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। पंचरंगी तप से जुड़े हुए तथा अन्य तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान श्रीमुख से स्वीकार किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में गुरु सन्निधि में आयोजित उपासक श्रेणी शिविर के समापन के संदर्भ में उपासक श्रेणी शिविर व्यवस्थापक श्री जयंतीलाल सुराणा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

उपासक-उपासिकाओं द्वारा सामूहिक गीत का संगान का संगान किया गया। श्री किरण लुणिया ने अपने शिविर के अनुभवों को प्रस्तुत किया। आचार्यश्री ने उपासक श्रेणी को पावन आशीष प्रदान करते हुए कहा कि परम पूजनीय गुरुदेव तुलसी के सान्निध्य व कार्यकाल में उपासक श्रेणी का प्रादुर्भाव हुआ था। वर्तमान में उपासक श्रेणी कुछ सक्षमता को प्राप्त है। यह श्रेणी बहुत उपयोगी है। कहीं साधु-साध्वियों के नहीं मिलने से संथारा आदि कराने में आदि में अच्छा आध्यात्मिक सेवा का कार्य हो सकता है। उपासक श्रेणी उपयोगितापूर्ण है। पर्युषण के दौरान भी इनका उपयोग होता है। उपासक श्रेणी स्वयं की संयम की साधना, ज्ञान का विकास, प्रेक्षाध्यान आदि के साथ संयम की चेतना के साथ धर्म का प्रचार करते रहने का प्रयास होना चाहिए। उपासक श्रेणी का अच्छा विकास और अच्छा उपयोग हो सकता है।

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