कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं, जो आदमी अकेले तय करता हैं – और कुछ ऐसी होती हैं जिनमें उसका ‘टिकट’ उसके बाद भी मान्य रहता हैं।
जी हाँ, टर्म प्लान वही टिकट हैं…
जिसका इस्तेमाल आप नहीं, आपके अपने करते हैं – वो भी उस हालत में जब आपकी “Life की ट्रेन” अचानक अंतिम स्टेशन पर पहुंच जाए।
अब आप सोचिए…
टर्म प्लान में ना बोनस मिलता हैं, ना ब्याज, ना कोई लड्डू…
बस एक वादा होता हैं – “अगर मैं नहीं रहा, तो मेरे बच्चे मंज़िल तक पहुँच जाएँ।”
अब लोग पूछते हैं – “मैच्योरिटी पे क्या मिलेगा?”
अरे भैया,
अगर टर्म प्लान मैच्योर हो गया मतलब आप खुद मैच्योर हो गए, यानी जिंदा हैं –
तो फिर और क्या चाहिए?
बच्चों की पढ़ाई, शादी, EMI सब आपकी आंखों के सामने हो गया – वही तो असली मैच्योरिटी हैं!
अब इस टर्म प्लान में अगर आप थोड़ा FD जैसा ‘बांड’ डाल दे,
तो वो ट्रेडिशनल एंडोमेंट बन जाएगा –
थोड़ा सज-धज के, बोरिंग सूट टाइप।
और अगर इसमें थोड़ी इक्विटी घोल दी जाए,
तो जनाब ULIP बन जाएगा –
जैसे “सूट के नीचे स्पोर्ट्स शूज!”
लेकिन टर्म प्लान,
वो तो शुद्ध देशी दाल-चावल हैं–
ना तड़का ज़रूरी, ना ग्रेवी,
सिर्फ पेट और परिवार दोनों भर जाता हैं।
तो अगली बार जब कोई बोले – “अरे इसमें मैच्योरिटी पे कुछ मिलता नहीं!”
तो उससे पूछना –
“तू इंश्योरेंस लेने आया है या लॉटरी खेलने?”
यात्रा का मक़सद मंज़िल तक पहुंचना होता हैं,
ना कि स्टेशन पर बैठकर रिटर्न टिकट का इंतज़ार करना।

