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क्यों परेशान हैं किसान ?

Last updated: December 13, 2018 11:39 am
Surabhi Saloni
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7 Min Read
प्रतीकात्मक तस्वीर
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों से एक बात साफ हो गई है कि बीजेपी को ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा झटका लगा है। यह स्थिति तब है जब केंद्र किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई योजनाएं और धनराशि आवंटित कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या गलत हुआ? हमने ऐसे 10 पॉइंट्स निकाले हैं जो इस कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं। आइए समझते हैं।
 लगातार 2 वर्षों का सूखा
साल 2014 और 2015 लगातार दो साल पड़े सूखे ने कृषि क्षेत्र की कमर तोड़ दी। सरकार ने इस सेक्टर के लिए भले ही पर्याप्त फंड्स का आवंटन किया हो लेकिन प्रॉजेक्टों के सुस्त क्रियान्वयन के चलते दर्द को कम नहीं किया जा सका। उधर, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में पड़े सूखे ने किसानों की पीड़ा को और बढ़ा दिया।
कृषि उत्पादों की कीमतें धड़ाम
कृषि उत्पादों की कीमतें भरभरा कर नीचे आ गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के कम होने से निर्यात भी प्रभावित हुआ वहीं, आयात होने के कारण देश के भीतर कीमतों पर चोट हुई। उदाहरण के लिए, 2016-17 में दालों का बंपर उत्पादन हुआ था लेकिन 6.6 मिलियन टन आयात होने से समस्या बढ़ गई। 2017-18 में 5.6 मिलियन टन और आ गया जिससे घरेलू कीमतें और भी कमजोर हो गईं। सरकार की तरफ से चूक यह हुई कि उसने आयात पर टैरिफ्स लगाने में देर कर दी, जिससे किसानों की समस्या ने विकराल रूप ले लिया।
 बीमा फेल!
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2016 में लॉन्च की गई, जिससे प्राकृतिक आपदा, कीटों और रोगों के कारण किसी भी फसल के बर्बाद होने पर किसानों को बीमा और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जा सके। इसका मकसद किसानों की आय को स्थिर रखना और यह सुनिश्चित करना भी था कि वे खेती करते रहें लेकिन ज्यादा प्रीमियम और बीमा कंपनियों द्वारा इनोवेशन में कमी जैसे कई कारणों से काफी कम किसान बीमा से जुड़े।
सिंचाई भी प्रभावित
खेती के लिए सिंचाई महत्वपूर्ण है। देश में ज्यादातर खेती योग्य भूमि के लिए किसान मॉनसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं। केंद्र ने 40,000 करोड़ का दीर्घकालिक सिंचाई फंड (नाबार्ड द्वारा संचालित) लॉन्च किया। इस प्रोग्राम के तहत 99 बड़े सिंचाई प्रॉजेक्टों को दिसंबर 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य था लेकिन इसकी प्रोग्रेस अब तक काफी सीमित है। विशेषज्ञ इसके लिए अफसरशाही की देरी समेत कई कारणों को जिम्मेदार मानते हैं।
मार्केटिंग नजरअंदाज
नीति आयोग के दस्तावेज के मुताबिक कृषि सेक्टर के विकास में मार्केटिंग की क्षमता को नजरअंदाज किया गया। पुराने कानून अब भी इस क्षेत्र में हावी हैं। इलेक्ट्रॉनिक मार्केट प्लेस विकसित करने के लिए काफी पहल हुई लेकिन बेहतर बाजारों तक किसानों की पहुंच अब भी एक बड़ा मसला है।Agricultural Produce Market Committee ऐक्ट में सुधार की रफ्तार काफी धीमी है और ज्यादातर राज्यों ने इस पर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। जानकारों का कहना है कि जीएसटी काउंसिल की तरह एक इकाई बनाकर राज्यों को साथ लाया जा सकता है और फिर केंद्र के साथ मिलकर सेक्टर के सुधार के लिए फैसले लिए जाएं।
आधुनिक तकनीक मिसिंग
कई कारणों के चलते आधुनिक तकनीक का कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल सीमित है। दरअसल, आधुनिक तकनीक तक पहुंच होने से बेहतर बीज, उपकरण आदि के जरिए उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। नीति आयोग के पेपर के मुताबिक हाल के समय में कोई वास्तविक तकनीकी सफलता नहीं मिली है।
खंडित आपूर्ति शृंखला
स्टोरेज, कोल्ड चेन्स में काफी गैप और सीमित कनेक्टिविटी के कारण किसानों की समस्या बढ़ गई है। OECD के अनुसार यही वजह है कि उत्पादन के बाद काफी फल और सब्जी (कुल का 4 से 16%) बर्बाद हो जाती है।
फूड प्रॉसेसिंग क्लस्टर्स का अभाव
दरअसल, किसानों को विविधता के लिए प्रोत्साहन कम दिया जा रहा है। OECD दस्तावेज के अनुसार, फूड प्रॉसेसिंग में हाई-वैल्यू सेक्टर का शेयर काफी कम है। फल, सब्जियां और मीट उत्पाद कुल का 5% और 8% ही प्रॉसेस होता है जबकि अनाज आधारित उत्पाद 21% और ऑइलसीड 18% है।
FCI सुधारों में देरी
सरकार द्वारा नियुक्त एक पैनल ने सुझाव दिया है कि FCI गेहूं और धान की खरीद के सभी ऑपरेशनों को राज्यों को सौंप दे, जिन्हें इस क्षेत्र का अनुभव है और उन्होंने खरीद प्रक्रिया के लिए पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है। ये राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और मध्य प्रदेश। सुझाव दिया गया है कि FCI की कायापलट की जाए और किसानों को सीधे कैश सब्सिडी (7000 रुपया/हेक्टेयर) दी जाए और उर्वरक क्षेत्र को विनियमित किया जाए। पैनल का कहना है कि सीधे कैश सब्सिडी मिलने से किसानों की काफी मदद होगी जो खाद आदि लेने के लिए ज्यादा रेट पर दूसरी जगहों से लोन लेने के लिए मजबूर होते हैं।
उत्पादन कम
GDP में कृषि क्षेत्र का शेयर 1990 में 29 फीसदी से 2016 में 17% पर आ गया लेकिन यह क्षेत्र अब भी रोजगार का बड़ा सॉर्स है। कृषि जनगणना 2016 के अनुसार केवल 5 फीसदी किसान ऐसे हैं जो 4 हेक्टेयर्स से ज्यादा जमीन पर खेती करते हैं। चीन, वियतनाम और थाइलैंड में दूसरे वैश्विक उत्पादकों की तुलना में औसत उत्पादन कम है। वैश्विक उत्पादन की तुलना में चावल का उत्पादन करीब 3 गुना कम है जबकि आम, केला, प्याज और टमाटर का उत्पादन 2 से 7 गुना कम है।

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