नई दिल्ली:पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे सिर्फ हार-जीत तक सीमित नहीं रहेंगे। बल्कि इन चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। विपक्ष की आगे की रणनीति का सारा दारोमदार इन चुनावों के नतीजे पर टिका है। यदि चुनावों के नतीजे कांग्रेस के हक में रहते हैं तो यूपीए को इससे मजबूती मिल सकती है और तब विपक्षी दल तीसरे मोर्चे के नहीं बल्कि यूपीए के साथ एकत्र हो सकते हैं। लेकिन यदि कांग्रेस राजस्थान तक ही सीमित रहती है तो फिर यह विपक्षी राजनीति को झटका होगा। नतीजे आने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है, लेकिन एग्जिट पोल से जो संकेत मिले हैं, उससे कांग्रेस खेमे में हलचल बढ़ी है।
कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ रही हैं। राजस्थान के साथ यदि कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जीतने में सफल रहती है। मिजोरम में दोबारा अपनी सरकार बना लेती है। तेलंगाना में उसकी सीटें बढ़ती हैं तो यह विपक्षी राजनीति में हवा फूंकने का काम करेगा। दरअसल, उत्तर प्रदेश उप चुनावों के बाद से विपक्ष में गठबंधन की राजनीति को लेकर सरगर्मियां रही हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन से विपक्षी राजनीति को दो फायदे हो सकते हैं। कुछ दल यूपीए का हिस्सा बन सकते हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में ही विपक्ष एकजुट होने की सोच सकता है। जबकि मौजूदा स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि कांग्रेस विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करेगी या नहीं।
नए दल यूपीए का दामन थाम सकते हैं
यूपीए में अभी 19 दल हैं। लेकिन इनमें से नौ का लोकसभा और 11 का राज्यसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। यूपीए में शामिल प्रमुख दलों में अभी एनसीपी, राजद, झामुमो, जेडीएस ही प्रमुख हैं। नए दलों में चंद्रबाबू यानी टीडीपी नए साथी हो सकते हैं। तेलंगाना में अभी कांग्रेस उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। इसी प्रकार कांग्रेस से दूरी दिखाकर चल रहे वामदल भी पहले की भांति एक बार फिर यूपीए के साथ खड़े हो सकते हैं।
एनडीए पर कुनबा बढ़ाने का दबाव बढ़ेगा
नतीजों को लेकर जिस प्रकार की संभावनाएं जताई जा रही हैं, वह एनडीए के लिए चिंताजनक हो सकते हैं। यदि कांग्रेस जीतती है तो लोकसभा चुनावों में एडीए पर कुनबा बढ़ाने का दबाव बढ़ेगा। अभी नाराज चल रहे कुछ दल एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं।
विपक्षी राजनीति की दिशा तय करेंगे चुनावी नतीजे

